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गुरुवार, 26 अप्रैल, 2007 को 04:05 GMT तक के समाचार

शफ़ी नकी जामी
बीबीसी संवाददाता,सेंट लूसिया

कांटे या बिना कांटे का मैच

शुरुआत से पहले कांटे का, शुरुआत के बाद बिना कांटे का और ख़त्म होते होते नाम बड़े और दर्शन छोटे ….कुछ यही कहा जा सकता है सेंट लूसिया में हुए दूसरे सेमीफाइनल के बारे में.

दक्षिण अफ्रीका का टॉस जीतना, टॉस जीतकर पहले बैटिंग का निर्णय करना, यहां तक तो ठीक बल्कि कहिए कि मैच कांटे का.

लेकिन 12 रन पर दो विकेट खो देना और फिर 26 रन से 27 रन यानि एक रन बनने में तीन और विकेटें गिर जाना तो कहिए कि अब हो गया बिना कांटे का. कहिए कि कांटे अब दक्षिण अफ्रीका का पीछा कर रहे थे.

और जब 93 रन तक आपकी टीम लगभग पेवेलियन लौट जाए तो समझ लेना चाहिए न कि दुकान समेटने का समय आ गया क्योंकि जब ओवर बाकी रह जाएं और बल्लेबाज़ न बचें और जो बचें वो बेचारे गेंदबाज़ हों जो तूफानी गेंदों को झेल रहे हों फिर तो कहानी ख़त्म हो गई न.

बस दक्षिण अफ़्रीका के साथ भी यही हुआ.

सेंट लूसिया में खेले गए इस मैच को मैं श्रीलंका के खिलाड़ियों के साथ देख रहा था. महेला जयवर्धने, मुरलीधरन, दिलशान, उपुल थरंगा. ये बीच बीच में बातें भी कर रहे थे.

ये वही टीम है जो न्यूज़ीलैंड को सेमी फाइनल में हराकर फाइनल में आए हैं. पता है क्या कह रहे थे...कह रहे थे अच्छा हुआ हमने अपनी आंखों से ये मैच देख लिया. बहुत कुछ सीखा भी है.

अब देखना ये है कि श्रीलंका का ये देख लेना और सीख लेना फाइनल में कितने काम आता है.

अरे हां ये तो मैंने आपको बताया ही नहीं कि दक्षिण अफ्रीका का 43 ओवर और 4 गेंदों में बनाया गया 149 रनों का स्कोर धुरंधर ऑस्ट्रेलिया ने 31 ओवर तीन गेंद में पूरा कर दिया.

सिर्फ तीन विकेट गिरे और वो जीत गए सात विकेट से.

आपको पता है न कि ऑस्ट्रेलिया इससे पहले दो बार विश्व कप जीत चुका है और अब हैटट्रिक का दरवाज़ा खटखटा रहा है.