रविवार, 18 मार्च, 2007 को 03:43 GMT तक के समाचार
सुनंदन लेले
संपादक, क्रिकेट टुडे
बांग्लादेश के हाथों भारत की हार को देखकर एक बार फिर लगता है कि ख़ुद को मुसीबत में डालना भारतीय टीम की आदत बन चुकी है.
यह एक बुरा सपना था कि भारत कहीं बांग्लादेश के हाथों हार न जाए और वह सही हो गया. बांग्लादेश ने बेहतरीन क्रिकेट का प्रदर्शन किया है.
भारत अब जिस मुसीबत में है उसमें इसके सिवा उसके सामने कोई चारा नहीं है कि वह अपने दोनों मैच जीते.
और सिर्फ़ जीते भर नहीं, अच्छे अंतर से जीते.
अगर कहें कि भारतीय टीम की पीठ दीवार से सटी हुई है, तो ग़लत नहीं होगा. और ऐसे में भारतीय टीम के सामने सिवा इसके कोई चारा नहीं है कि वह लड़े.
डर के मारे
जहाँ तक इसका सवाल है कि आगे क्या भारतीय टीम अच्छा खेल सकेगी, तो मेरा मानना है कि क्रिकेट के लिए नहीं लेकिन डर के मारे भारतीय खिलाड़ी अच्छा खेलेंगे.
अगर उनका भी हश्र पाकिस्तान की तरह हो गया और उन्हें भी विश्वकप से बाहर होकर वापस लौटना पड़ा तो लौटना मुश्किल होगा.
जो अनुभवी खिलाड़ी हैं, वो जानते हैं कि 2003 में जब वे लौटे थे तो क्या परेशानियाँ हुई थीं. उनके घरों पर पत्थर भी फेंके गए थे.
खिलाड़ी वो सब अभी भूले नहीं हैं.
पाक टीम की हार
यह उम्मीद किसी को नहीं थी कि जो हश्र भारतीय टीम का हुआ वही पाकिस्तान का भी हो जाएगा.
वेस्टइंडीज के सामने हारना तो समझ में आता है लेकिन यह कोई नहीं सोच सकता था कि आयरलैंड जैसी नौसिखिए टीम के सामने भी पाकिस्तान इस तरह धराशाई हो जाएगा.
अब पाकिस्तान की टीम के लिए वापस लौटना एक मुश्किल काम है.
1992 की विश्वविजेता 2007 में सुपर आठ में भी जगह न बना पाए तो क्या कहा जाए.
जब टीम वापस पहुँचेगी तो पूरी टीम बदली जाएगी, टीम मैनेजमेंट बदला जाएगा और कोचिंग स्टाफ़ को भी बदल दिया जाएगा.
और ऐसा होना निश्चित है.