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शनिवार, 03 फ़रवरी, 2007 को 17:14 GMT तक के समाचार

मुकेश शर्मा
बीबीसी हिंदी संवाददाता

शास्त्री की आउडी में जैसे हम भी घूमे थे

क्रिकेट में एक रन कब हुआ या चौके और छक्के का मतलब क्या हुआ ये कभी किसी ने बैठाकर समझाया नहीं और न ही ये जानने के लिए कभी किताब खोलने की ज़रूरत हुई. पता नहीं कब चौकों और छक्कों पर तालियाँ बजाना शुरू किया था, टेलीविज़न पर मैच देखकर नहीं रेडियो पर कान लगाए कमेंट्री सुनते हुए.

क्रिकेट देखने की पहली याद बड़े भैया के मैच देखने की है. लखनऊ में निराला नगर के पटेल पार्क में बड़े भैया मैच खेलने जाते थे.

उनके साथ ही मैं भी जाता था और बाउंड्री पर स्कोरर के पास बैठता था ये देखने के लिए कि कहीं वो स्कोर में गड़बड़ तो नहीं कर रहा है.

बल्ला पकड़ना, गेंद फेंकना, 22 क़दमों के साथ दोनों विकेटों के बीच की दूरी तय करना ये सब वहीं से देखते हुए सीखा.

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क्रिकेट मैच जब आता था तो रेडियो पर कान लगाए सुनते थे और उस उम्र में कान में जैसे ही अँगरेज़ी की कमेंट्री पड़ती थी तो सिर्फ़ शोर का ही सहारा होता था, ये जानने के लिए कि विकेट गिरा या चौका-छक्का लगा. आज भी याद है कि पहली बार करेंट का झटका भी रेडियो ठीक करने की कोशिश में ही लगा था.

'करिश्माई कपिल'

कपिल देव की कप्तानी में जीता विश्व कप दुर्भाग्य से स्मृति में नहीं है, ग़लती मेरी याददाश्त की और रुचियों की नहीं बल्कि मेरी उम्र की थी. तब मैं बहुत ही छोटा था, वो मैच समझने और उसे याद रखने के लिए.

भारत की जीत की पहली ख़ुशी उस मैच की याद है जब वर्ल्ड चैंपियनशिप में रवि शास्त्री को आउडी कार मिली थी और पूरी टीम उस पर चढ़कर मैदान में घूमी थी. ऐसा लग रहा था जैसे टीम के बीच में कहीं मैं भी उस आउडी में बैठकर उस माहौल का आनंद उठा रहा हूँ.

उसके बाद की तस्वीरें काफ़ी हद तक साफ़ हैं. फिर वो चाहे 1987 के विश्व कप के सेमिफ़ाइनल में माइक गैटिंग के रिवर्स स्वीप हों या इमरान ख़ान की कप्तानी में पाकिस्तान को मिला विश्व कप.

क्रिकेट से मेरा लगाव बड़े भैया के ज़रिए ही बढ़ा था. उन्हें तो न जाने कितने मैचों के स्कोर, खिलाड़ियों के आँकड़े मुँहज़बानी याद थे.

इंग्लैंड के विरुद्ध 1990 में लॉर्ड्स में हेमिंग्स की गेंद पर कपिल ने चार छक्के लगाकर भारत का फ़ॉलोऑन कैसे बचाया था, इसकी कमेंट्री उनसे सुनना बहुत अच्छा लगता था और हर बार जैसे वही रोमाँच होता था.

कपिल के कुछ ऐसे ही करिश्मे थे कि वही हमेशा सबसे पसंदीदा खिलाड़ी रहे. वैसे गावस्कर का अंदाज़ भी काफ़ी अच्छा लगता था.

मोहल्ला क्रिकेट

फिर मैंने भी अपने मोहल्ले की टीम की ओर से क्रिकेट खेला, स्कूल में क्रिकेट खेला और बचपन में तो मैं अपनी टीम का कप्तान भी था.

वैसे उस समय कप्तानी सबसे अच्छे खेल की बजाए अपनी धाक से मिलती थी. धाक इस बात की थी कि पढ़ने में अच्छे थे, इसलिए टीम की कप्तानी भी हम ही करेंगे.

वैसे उस समय तो खिलाड़ी भी बुरे नहीं थे, ऑलराउंडर का तमग़ा था अपने नाम पर. मगर समय बीतने के साथ हर आम परिवार की तरह पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में ऑलराउंडर होने का दबाव बढ़ता गया और मैदान पर का वो प्रदर्शन फीका हो गया.

आज मैच देखकर न तो वैसा रोमाँच होता है और न ही हार पर उतना दुःख. पता नहीं हम इतने बड़े हो गए हैं या टीम का प्रदर्शन इतना बुरा हो चला है.