शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 14:15 GMT तक के समाचार
जावेद नक़वी
वरिष्ठ पत्रकार
क्या क्रिकेट ना होता, तो बँटवारा ना होता या दोनों मुल्कों में जंग नहीं होती. मैं नहीं समझता कि क्रिकेट की वो भूमिका है जो हम लोग अक्सर मानने को तैयार हो जाते हैं.
ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड को ही देखिए- ऐशेज़ को लेकर उनका जुनून किसी भी तरह कम नहीं.
लेकिन क्या वो किसी जंग या दुश्मनी पर आधारित है या फिर क्या इससे किसी मुद्दे पर सुलह हो जाती है. नहीं.
मैं नहीं समझता हूँ कि भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट संबंधों को आवाम के उतार-चढ़ाव से जोड़ना चाहिए, लेकिन इसमें सियासत का दख़ल ज़रूर रहा है.
राजनीति के कारण ही वर्षों तक दोनों देश नहीं खेले. दोनों देशों के बीच तनाव का असर क्रिकेट पर पड़ता है, ये तो सच्चाई है. दोनों देशों के बीच संबंध में क्रिकेट को बंधक तो बनाया गया है.
ग़लतफ़हमी
राजनीति में क्रिकेट का इस्तेमाल होता है लेकिन इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता. क्रिकेट ना खेलने के कारण दोनों देशों की जनता के बीच कई ग़लतफ़हमियाँ रही हैं.
एक वक़्त ऐसा भी था जब रिश्ते नहीं थे, आना-जाना नहीं था. उस दौर में दोनों देशों के नागरिकों ने पता नहीं क्या-क्या सोच लिया था एक-दूसरे के बारे में. जैसे भारत में ऐसा होता है, पाकिस्तान में बहुत ख़तरनाक स्थिति है.
लेकिन जब हालात सुधरे तो लोगों को ये पता चला कि पाकिस्तान में असमा जहाँगीर भी हैं, बादशाह ख़ान हैं, जो हिंदुस्तान से मोहब्बत करते हैं.
ऐसा क्रिकेट के कारण नहीं था. दोनों मुल्कों में ऐसी दीवार खड़ी कर दी गई थी कि मेल-मिलाप बिल्कुल बंद हो गया था. उस समय सिर्फ़ कयास लगाए जाते थे कि भारत ऐसा है और पाकिस्तान ऐसा है.
मैं इससे इनकार नहीं करता कि क्रिकेट के बहाने रिश्ते सुधरे हैं. क्योंकि मैच देखने लोग एक-दूसके के यहाँ जाते हैं. एक हिंदुस्तानी लाहौर गया, तो उसे महसूस हुआ कि टैक्सी वाला तो उनसे पैसा भी नहीं ले रहा.
इस दौरान इस तरह की कई बातें सामने आईं, तो पहले हमने छिपाने की कोशिश की थी. क्रिकेट इन दूरियों को पाटने का एक बहाना तो ज़रूर बना.
हो-हल्ला
लेकिन मेरा यही कहना है कि इन सबके बावजूद क्या क्रिकेट नहीं होता तो शिमला समझौता नहीं होता या ताशकंद समझौता नहीं होता.
कई बार कट्टरपंथी पार्टियाँ इन दोनों देशों के बीच रिश्तों को क्रिकेट से जोड़कर हवा दे देती हैं. मजाल है कि पाकिस्तान की टीम मुंबई में खेले और शिवसेना वाले हल्ला नहीं करे.
उसी तरह जब भारतीय टीम एक बार श्रीनगर गई, तो पाकिस्तान समर्थकों ने वहाँ पिच खोद दी. लेकिन इस बात को ज़्यादा तूल नहीं देनी चाहिए. ये बहुत सीमित वर्ग है.
ये बात भी सच है कि जब भारतीय टीम पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खेलती है, तो खिलाड़ियों पर एक अलग तरह का दबाव होता है.
पते की बात तो ये है कि बहाना चाहिए मिलने का और अगर क्रिकेट के माध्यम से ही मेल-मिलाप बढ़ता है, तो ये बहुत अच्छी चीज़ है.
वर्ष 2003 में भारत की टीम पाकिस्तान गई, तो उसका जिस तरह स्वागत हुआ वह देखने लायक़ था. उसी तरह जब कुछ वर्ष पहले वसीम अकरम की अगुआई वाली पाकिस्तान की टीम चेन्नई में जीती तो लोगों ने खड़े होकर तालियाँ बजाई.
इस माहौल में जब अभी भी दोनों देशों की सेनाएँ एक-दूसरे को दुश्मन ही समझती हैं, लोग खड़े होकर एक-दूसरे के लिए तालियाँ पीटते हैं, तो ख़ुशी तो महसूस होती ही है.