शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 17:24 GMT तक के समाचार
वेदिका त्रिपाठी
मुंबई से
क्रिकेट की लोकप्रियता को भाँपते हुए हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में समय-समय पर इस पर या क्रिकेटरों को लेकर फ़िल्में बनती रही हैं. कई क्रिकेटरों को भी मैदान से फ़िल्मी मैदान में उतारा गया लेकिन दर्शकों ने इन्हें सिरे से नकार दिया.
सुनील गावसकर, संदीप पाटिल, सैयद किरमानी, विनोद कांबली, अजय जडेजा, सलिल अंकोला जैसे क्रिकेटरों ने क्रिकेट मैदान छोड़कर फ़िल्मी परदे पर अपनी क़िस्मत आज़मानी चाही, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.
सुष्मिता सेन के साथ एक अनाम फ़िल्म में काम करने के लिए क्रिकेटर ब्रायन लारा का भी नाम इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है.
चरित्र, अनर्थ, साइलेंस प्लीज़-द ड्रेसिंग रूम, कुरूक्षेत्र, स्टम्प्ड, इक़बाल, खेल, अव्वल नंबर, लगान जैसी कुछ फ़िल्में हैं जिनमें या तो क्रिकेटर्स ने अभिनय किया है या फिर इनका विषय क्रिकेट के खेल से प्रेरित है.
1973 में बीआर इशारा के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘चरित्र’ में जाने-माने क्रिकेटर सलीम दुर्रानी ने अभिनय किया था. हालाँकि इशारा की कुछ और राय है.
अनुभव
उन्होंने बताया, “मैंने उन्हें एक क्रिकेटर की हैसियत से अपनी फ़िल्म में नहीं लिया था बल्कि उस किरदार के लिए जो चेहरा मुझे चाहिए था वह मुझे सलीम में दिख गया. शुरुआत में तो वो उन्हें अभिनय करने में थोड़ी हिचक महसूस हो रही थी लेकिन धीरे-धीरे वो अच्छी एक्टिंग करने लगे. मुझे इनके क्रिकेटर होने से कोई फ़ायदा तो नहीं हुआ था बल्कि कई वजहों से नुकसान ही हुआ."
यह फ़िल्म मुंबई में तो कुछ ख़ास नहीं चली थी लेकिन बंगाल जैसी जगहों पर दर्शकों ने इसे पसंद किया था.
1990 में देव आनंद ने फ़िल्म ‘अव्वल नंबर’ बनाई. इस फ़िल्म में मुख्य किरदार आमिर ख़ान का था.
देव साब कहते हैं, "मेरे ख़्याल से यह फ़िल्म क्रिकेट पर बनी फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ है. फ़िल्म लगान का भी क्लाइमेक्स वही था जो मेरी फ़िल्म में था. मैं यह नहीं कहता कि वो मेरी नकल थी. उस वक़्त भी फ़िल्म ख़त्म होते-होते पूरा सिनेमा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता था."
इस फ़िल्म को लोगों ने पसंद तो किया था लेकिन परदे पर अपना जादू बिखेरने में फ़िल्म विफल रही थी.
इन सारी सामान्य क्रिकेट फ़िल्मों से हटकर अगर कोई फ़िल्म आई तो वो थी ‘साइलेंस प्लीज़- द ड्रेसिंग रूम’. इस फ़िल्म के निर्देशक संजय श्रीनिवास थे और यह फ़िल्म क्रिकेट की बाहरी दुनिया नहीं बल्कि ड्रेसिंग रूम की कहानी पर आधारित थी.
वैसे यह फ़िल्म भारत बहुत ही कम सिनेमाघरों में लगी थी और शायद इसलिए ज़्यादा कारोबर भी नहीं कर पाई लेकिन अमरीका, कनाडा जैसी जगहों पर इसका अच्छा व्यवसाय हुआ था. इसके अलावा यह फ़िल्म डीवीडी बाज़ार में हाथों-हाथ बिक रही थी.
संजय श्रीनिवास बताते हैं, "इस फ़िल्म के पहले द ड्रेसिंग रूम नामक मेरा एक प्ले हुआ था जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया था. फिर मैंने सोचा कि आज तक लोगों को सिर्फ़ क्रिकेट की बाहरी दुनिया के बारे में पता है लेकिन मेरी इस फ़िल्म के ज़रिए वे जान सकेंगे कि मैदान में उतरने से पहले उनके ड्रेसिंग रूम में किस तरह की बातें और क्या माहौल होता है."
संजय इस फ़िल्म के बॉक्स ऑफ़िस पर नहीं चलने की वजह इसके पेश करने के तरीक़े को मानते हैं. भारत में लोगों को इस फ़िल्म के बारे में जानने का मौक़ा ही नहीं मिला क्योंकि इसे कमर्शियल फ़िल्म की तरह ट्रीट नहीं किया गया.
कामयाबी नहीं
अगर क्रिकेट की फ़िल्मों पर गौर किया जाए तो इनके सफल होने की संख़्या गिनतियों में है. जैसा कि फ़िल्म समीक्षक विकास मोहन कहते हैं, “आज तक जितनी भी फ़िल्में क्रिकेटरों को लेकर बनी हैं वो असफल ही हुई हैं फिर चाहे वह संदीप पाटिल हो, सुनील गावसकर हों या फिर अजय जडेजा. क्रिकेटर से अभिनेता बने क्रिकेटरों को दर्शकों से नकार दिया."
उनका मानना है कि अभिनय करना हर किसी के बस की बात नहीं है और जिस प्रैक्टिस के साथ क्रिकेटर मैदान पर अपनी पैठ बना सकते हैं वह फ़िल्मों में संभव नहीं है.
क्रिकेटर से अभिनय के रास्ते पर निकले सलिल अंकोला फ़िल्मों में तो सफल नहीं हो पाए लेकिन छोटे परदे पर उनके अभिनय की तारीफ़ ज़रूर हुई.
उन्होंने फ़िल्म कुरूक्षेत्र, पिता, चुरा लिया है तुमने और साइलेंस प्लीज़ की तो साथ ही ‘कोरा क़ाग़ज़’ और अन्य धारावाहिकों में भी नज़र आए. विनोद कांबली ने रवि दीवान की फ़िल्म ‘अनर्थ’ से बड़े परदे पर उतरने की कोशिश की, लेकिन असफलता ही हाथ लगी.
इसके अलावा क्रिकेट की दुनिया में चॉकलेटी फेस के नाम से जाने जाने वाले क्रिकेटर अजय जडेज़ा भी सुनील शेट्टी और सेलिना जेटली अभिनीत और यूसुफ़ ख़ान निर्देशित फ़िल्म ‘खेल’ में अपने अभिनय के जलवे नहीं बिखेर पाए और यह फ़िल्म भी बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी थी.
1988 में सुनील गावसकर ने केवल शर्मा निर्देशित कॉमेडी फ़िल्म ‘मालामाल’ से परदे पर अपनी हाज़िरी लगानी चाही लेकिन सफलता इनसे कोसों दूर भागती दिखी.
इसके बाद सुनील गावसकर और संदीप पाटिल ने एक मराठी फ़िल्म में काम किया जिसकी हीरोइन पूनम ढ़िल्लो थीं. 2003 में रवीना टंडन की फ़िल्म ‘स्टम्पड’ भी इसी विषय को लेकर थी.
कपिल देव जैसे खिलाड़ी भी बड़े परदे की इस रौनक से ज़्यादा दिन तक दूर नहीं रह पाए. इन्होंने ‘इक़बाल’, ‘मुझसे शादी करोगी’ जैसी इक्का दुक्का फ़िल्मों में ख़ास मेहमान के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाई है.
समय-समय पर दर्शकों की भावनाओं से खेलते इन लोगों को यह आभास नहीं है कि मैदान के धुरंधरों को दर्शक विज्ञापन तक सह सकता है लेकिन बड़े परदे पर कतई नहीं.
हाँ, ये ज़रूर है कि क्रिकेट को लेकर बनी फ़िल्म लगान ने बॉक्स ऑफ़िस पर कई रिकॉर्ड बनाए. हालाँकि निर्माता आमिर ख़ान और निर्देशक आशुतोष गोवारीकर ये कहते नहीं थकते कि उनकी फ़िल्म क्रिकेट पर नहीं है.
लेकिन इतना तो सच है ही कि फ़िल्म में क्रिकेट की लोकप्रियता को भुनाया गया और यह प्रयोग सफल भी रहा.
जहाँ अब ये तो वक़्त और हालात ही बता पाएँगे कि फ़िल्मों में क्रिकेटरों के इतिहास को देखते हुए फ़िल्मकार इन्हें अपनी फ़िल्मों में मौक़ा देने के लिए अपने आपको तैयार कर पाएँगे या नहीं?