शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 15:12 GMT तक के समाचार
प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद
समाजशास्त्री
जाति प्रथा की तरह सांप्रदायिकता भी हमारे देश का एक अभिशाप है. जहाँ ज़रूरत ना हो वहाँ भी घर कर लेता है.
क्रिकेट इंसानी मान्यताओं के अनुसार रोमांच का एक माध्यम है. लेकिन हमारे देश में वो एक सांप्रदायिक मुद्दा बन गया है.
ख़ासतौर से अगर मुक़ाबला हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच हो तो मुकाबलों को सांप्रदायिक स्वरूप ले लेना अनिवार्य है.
यह मान लिया जाता है कि हिंदुस्तान की टीम की हिमायत सिर्फ़ हिंदू करेंगे और मुसलमानों का समर्थन पाकिस्तान टीम के पक्ष में जाएगा.
यह मानसिकता या सोच वास्तव में उतनी सच नहीं है, लेकिन सांप्रदायिक राजनीतिक दलों ने कुछ ऐसी ही मानसिकता तैयार कर दी है.
इसका नतीजा अक्सर यह होता है कि क्योंकि मुसलमानों के देश के प्रति लगाव पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया जाता है इसलिए दिखावे में और सांप्रदायिक ताक़तों के लिए वो और भी बढ़-चढ़ कर तानाकशी के रूप में पाकिस्तान टीम के साथ हमदर्दी दिखाने लगते हैं.
नतीजा
नतीजा यह होता है कि मुसलमानों का हिंदुस्तानी टीम के साथ न होने का विचार और पुष्ट हो जाता है और कुल मिला के मानसिकता ऐसी बनती है कि मानों मुसलमान स्वयं में एक पाकिस्तानी है और उनकी हमदर्दी हिंदुस्तानी टीम के साथ नहीं हो सकती.
धीरे-धीरे यह मानसिकता इतनी प्रबल हो गई है कि अब तो पूछे बगैर ही हम यह मान लेते हैं कि अगर कोई व्यक्ति मुसलमान है तो उसकी हमदर्दी पाकिस्तान टीम के साथ ही होगी.
मैं एक कॉलेज में पढ़ने वाली एक महिला को जानता हूँ. कॉलेज की एक अध्यापिका उसको बहुत मानती थी और उसका बड़ा ख़्याल करती थीं.
एक दिन जब हिंदुस्तान-पाकिस्तान मैच हो रहा था उन अधिकारियों ने उसे कहा कि तुम्हारी हमदर्दी तो पाकिस्तान टीम के साथ ही होगी.
नतीजा यह हुआ कि उसके बाद अपनी अध्यापिका के तरफ़ उस महिला का रवैया ही बदल गया. यहाँ तक कि जब अध्यापिका का देहांत हुआ तो उसने क्रिया-कर्म में शामिल होने की ज़रूरत नहीं समझी.
कुल मिलाकर क्रिकेट में सांप्रदायिकता के दाख़िल होने से वातावरण तो ख़राब ही हुआ बल्कि आपसी रिश्तों में दरार आ जाती है.
समझने की बात यह है कि सारे समय न तो एक व्यक्ति हिंदू होता है न ही मुसलमान होता है. उसका हिंदू या मुसलमान होना संदर्भ पर निर्भर होता है.
जहाँ भूमिका धार्मिक हो व्यक्ति का अपनी हिंदू या मुसलमान पहचान को केंद्रित करना स्वभाविक है. लेकिन जब हम निरपेक्ष मुद्दे को धार्मिक नज़र से देखने लगते हैं तो परिस्थिति दूसरी हो जाती है.
ऐसी परिस्थिति में अगर हम किसी के धर्म को केंद्रित करने लगते हैं तो उसके न चाहने के बाद भी उसे अपने को उसी दृष्टिकोण से देखना पड़ता है. मन से ना चाहे लेकिन ज़िद में फिर वो अपने को धार्मिक परिप्रेक्ष्य में पेश करने लगता है.
सांप्रदायिक ताक़तों की मुसलमानों को पाकिस्तान के समर्थक होने की दृष्टि का ही नतीजा है कि वो अपना आक्रोश दिखाने के लिए उसी प्रकार से व्यवहार करने लगता है जैसे उसका सांप्रदायिक ताक़तें प्रतिबिंबित करने की कोशिश करती है.
प्रभाव
आश्चर्य की बात यह है कि पढ़े-लिखे लोग इस मानसिकता के प्रभाव में ज़्यादा आसानी से आ जाते हैं. लेकिन यह आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि सांप्रदायिकता पढ़े-लोगों में ही ज़्यादा आसानी से अपना घर कर लेती है.
सौभाग्य की बात है कि अनपढ़ और गँवार, जो धर्म को मानते हैं, सामाजिक स्तर पर फिर भी निरपेक्ष विचारधारा रखते हैं.
क्रिकेट में सांप्रदायिकता 80 के दशक में अपनी चरमसीमा पर थी. धीरे-धीरे अगर लोगों के विचार या मानसिकता पूरी तरह न भी बदली हो परिस्थिति कुछ हद तक सामान्य हुई है.
आज भारत-पाकिस्तान मैच हो तो मुसलमान की देशभक्ति पर या उसके हिंदुस्तानी टीम का पक्ष लेने पर शक नहीं किया जाता है. इसका प्रमुख कारण यह है कि सांप्रदायिक राजनीतिक दलों को अब इस मुद्दे में दिलचस्पी कम हो गई है.
एक ही ढोल पीटते रहने से उसको फ़ायदा मिलने की संभावना नहीं हो तो वो ध्यान दूसरी तरफ कर देते है.
इसी कारण आज के संदर्भ में भारत-पाकिस्तान के मैच भी उतनी सांप्रदायिकता नहीं दिखाई देती जितना यह पहले थी. यह क्रिकेट के लिए भी और समाज के लिए एक राहत देने वाला परिवर्तन है.