शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 16:34 GMT तक के समाचार
सत्येंद्र रंजन
वरिष्ठ पत्रकार
बात जब क्रिकेट की होती है तो यह तथ्य कुछ परेशान सा करता है. क्रिकेट के बारे में सच्चाई यह है कि यह खेल अगर एक अंतरराष्ट्रीय खेल के रूप में अपना अस्तित्व बचाए हुए है तो उसके पीछे भारतीय बाज़ार की शक्ति सबसे महत्वपूर्ण है.
क्रिकेट की कुल आमदनी का 80 से 90 फ़ीसदी हिस्सा भारतीय बाज़ार की बदौलत आता है. भारत जैसी एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था और यहाँ के क्रय शक्ति वाले बड़े मध्य वर्ग में क्रिकेट आज भी खेल का पर्यायवाची बना हुआ है.
इतना कि जिस साल फुटबॉल का विश्व कप आयोजित हुआ, तब भी यानी 2006 में विज्ञापनदाताओं ने क़रीब 1100 घंटे का विज्ञापन क्रिकेट के लिए दिया, जबकि फुटबॉल बमुश्किल 400 घंटे का विज्ञापन जुटा सका.
असल में हर साल ही कुल खेल विज्ञापन का दो तिहाई हिस्सा क्रिकेट ले जाता है. अगर दुनिया में क्रिकेट की नई पहचान पर गौर करें तो भारतीय और दक्षिण एशियाई मूल के लोग इसमें सबसे ज़्यादा नज़र आते हैं.
टीम भले इंग्लैंड की हो, लेकिन उसमें मोंटी पनेसर और साजिद महमूद जैसे नामों की संख्या बढ़ती जा रही है.
कर्ता-धर्ता
करीब एक दशक पहले जब आईसीसी ने क्रिकेट का भूमंडलीकरण करने की ठानी तो सामने यही आया कि टीम हॉलैंड की बने, अमरीका की या मलेशिया की, असल में वह दक्षिण एशियाई मूल के चेहरों से ही भरी रहती है और ऐसे चेहरे ही वहाँ इस खेल के कर्ता-धर्ता रहते हैं.
अब सवाल यह है कि जब क्रिकेट की भारत में ऐसी मौजूदगी है, और भारत की क्रिकेट के संचालन और प्रसार में ऐसी हैसियत है तो उसी के मुताबिक़ भारत के पास टीम क्यों नहीं है?
इस चर्चा में अक़्सर कई पहलू सामने आते हैं. खेल ढाँचे का अभाव, खिलाड़ियों को शुरुआती उम्र में सही प्रशिक्षण न मिलना, खेल के लिए प्रोत्साहन की कमी, खेल प्रबंधन में भ्रष्टाचार और क्रिकेट बोर्ड का ग़ैर पेशेवर हाथों में होने की चर्चा की जाती है. या फिर ठीकरा ख़ुद खिलाड़ियों के सिर फोड़ा जाता है.
कहा जाता है कि वो विज्ञापन करने में इतने मशगूल रहते हैं कि अपना असली काम भूल जाते हैं. इसमें संदेह नहीं कि इन सभी बातों में कुछ सच्चाई है.
इसके बावजूद यह सच्चाई अपनी जगह बनी हुई है कि जिस खेल को भारत के राजे-रजवाड़ों ने अपने औपनिवेशिक मालिकों से अपनाया, लंबे समय तक जो उनके ही मनोरंजन का साधन रहा, लेकिन अब जिसकी लोकप्रियता का भारत में कोई सानी नहीं है, उस क्रिकेट में भारत आज तक ऐसी टीम तैयार नहीं कर सका है, जो किसी बड़े टूर्नामेंट में संभावित विजेता की प्रतिष्ठा के साथ पहुँच सके.
आख़िर क्यों? अगर हम अपनी खेल संस्कृति और राष्ट्रीय मनोविज्ञान में झाँकें तो शायद इसके कुछ सूत्र तलाश सकते हैं.
हमारे राष्ट्रीय मनोविज्ञान में आज भी शायद सबसे बड़ी कमी यही है कि आम तौर पर पूरी दुनिया हमारी निगाह में नहीं होती.
जिस उपनिवेशवाद से संघर्ष करते हुए भारतीय राष्ट्र का विकास हुआ, हमारी सोच उसी की दुनिया में सिमटी रही है.
ब्रिटिश अभिजात्य को उसके ही खेल में चुनौती देना भारतीय, बल्कि इंग्लैंड के ग़ुलाम रहे उन सभी देशों के सामाजिक मनोविज्ञान का हिस्सा रहा, जहाँ यह खेल अपनी जड़ें जमा सका था.
आज़ादी के बाद भी भारत अपनी सोच में इस दुनिया से नहीं निकल सका.
मिशन
इस बीच आज़ादी देश के विभाजन के साथ आई और नए बने भारत और पाकिस्तान में युद्ध और दुश्मनी का माहौल लगातार बना रहा तो उस खेल में, जिसे औपनिवेशिक जमाने में दोनों देशों के कुलीन तबकों ने अपनाया था, एक-दूसरे को परास्त करना एक बड़ा मिशन बना रहा.
लेकिन इस बीच यह बात भुला दी गई कि क्रिकेट आखिर चंद देशों में खेला जाने वाला खेल है. यह एक ऐसा खेल है, जो आधुनिक युग में किसी देश को विश्व पहचान नहीं देता.
और मुश्किल यही है कि भारत में ऐसी पहचान की कोई ललक आज तक नहीं देखी जाती. चंद देशों के बीच प्रतियोगिता में कुछ खिलाड़ियों की निजी प्रतिभा की चमक और उपलब्धियाँ हमारे मनोविज्ञान को संतुष्ट कर देती हैं.
पूँजीवाद के विकास के साथ विज्ञापन और मीडिया का बना बड़ा बाज़ार उन खिलाड़ियों का महिमामंडन करते हुए देश को कृत्रिम नायक प्रदान करता है. लेकिन इससे देश की खेल संस्कृति नहीं बदलती.
कभी इस बात को लेकर बेचैनी नहीं देखी जाती कि आख़िर इस खेल का भी आधुनिक और पेशेवर ढंग से प्रबंधन आख़िर देश में क्यों नहीं किया जाता.
दुर्भाग्य से भारत में जो चीज़ नहीं है, वह है विश्व प्रतिस्पर्धा की भावना.
(लेखक एनडीटीवी इंडिया में काम करते हैं और क्रिकेट पर लगातार लेखन करते रहे हैं)