शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 19:07 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
मेरे जीवन में क्रिकेट की शुरुआत हुई एक रुपए में मेले में मिलने वाले प्लास्टिक के बैट-बॉल से. लड़खड़ाते क़दमों से आंगन में गिरते हुए इसे खेलना बहुत ही मज़ेदार था.
पता नहीं इतना मज़ा सचिन को भी आज का खेल खेलते हुए आ पाता होगा या नहीं. फिर बड़े हुए और फ़ुटबॉल, गुल्ली-डंडा, बैडमिंटन और हॉकी पर भी हाथ साफ़ किया.
पिताजी हॉकी के अच्छे खिलाड़ी थे इसलिए क्रिकेट को ज़्यादा पसंद नहीं करते थे. फिर भी इन सबके बीच क्रिकेट जमकर खेला, इसके लिए होमवर्क छोड़ा, गेंद के लिए पैसों की जोड़-तोड़ की, घर पर मार खाई, घुटने छिलवाए पर क्रिकेट चालू रहा.
प्लास्टिक और कैनवस की गेंद से जल्द ही मोह भंग हो गया. लेदर की हॉकी वाली गेंद क्रिकेट की लेटर बॉल से ज़्यादा टिकाऊ साबित होती थी इसलिए निवेश उसी में किया जाता था.
तीन मैचों के बाद जब वो गेंद उखड़ना शुरू हो जाती थी तो उसकी जगह होती थी कोई पुराना मोजा. मोजे में बांधा, बरामदे के छज्जे में लटकाया और फिर शुरू हो गए.
रोमांच
मैच खेलना और मैच देखना, दोनों की रोमांचक लगता था. देखते-देखते पता चला कि यह जो टीन-एजर सबको हिला रहा है, यह सचिन है और साथ ही इस बात का बोध भी कराया गया कि अगर खेलना ही है तो इसकी तरह बनकर दिखाओ.
मगर साहब, अच्छा क्रिकेटर बनना मुझे गेंद की तरह गोल लगा. सो अपन घरेलू क्रिकेट खेलते रहे. मोहल्ला वर्सेज मोहल्ला होता था. कभी जीत, कभी हार और कभी बेईमानी के आरोप-प्रत्यारोप के बीच मैच रद्द हो जाता था.
एक ख़ास अनुभव यह रहा कि हमारी टीम निम्न-मध्यवर्ग के लोगों की थी और कुछ दूरी पर उद्योगपतियों की कोठियाँ थीं. हमारा उन घरों के बच्चों से मैच होता था.
हमारे पास रनिंग के लिए सीसम का एक बल्ला और एक अदद खरीदा गया बल्ला था. बस, यही कुल जमा किट थी. उनके पास पैड, ग्लव्ज़, कैप, अच्छे स्टंप और तमाम दूसरी चीज़ों के साथ ही पानी लेकर तैयार खड़े नौकर भी होते थे.
इत्तफ़ाक कहें कि क्या, वे हमसे एक भी मैच नहीं जीत पाए. बाद के वर्षों में जब लगान देखी तो बड़ा मज़ा आया. लगा, हम रियल लाइफ़ के आमिर थे.
........पर अब मैं क्रिकेट नहीं खेलता. जानते हैं क्यों, मैंने कोलकाता में 13 मार्च, 1996 की रात कांबली को रोते हुए पवेलियन की ओर जाते देखा था.
भारत श्रीलंका के ख़िलाफ़ विश्व कप-1996 का सेमीफ़ाइनल हार गया था और भारत के साथ मैं भी.