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गुरुवार, 26 अक्तूबर, 2006 को 14:09 GMT तक के समाचार

मानक गुप्ता
बीबीसी संवाददाता, मोहाली से

सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सुनीता के कंधों पर

न्यूज़ीलैंड के शेन बॉन्ड और भारत की जानी मानी एथलीट रह चुकीं सुनीता रानी में क्या समानता है?

आप सोचेंगे दोनों खेलों की दुनिया से जुड़े है,और क्या.

लेकिन अगर मैं कहूँ कि दोनों ही आज कल मोहाली के पीसीए स्टेडियम में नज़र आ जाते हैं तो आप ज़रूर सोच में पड़ जाएँगे.

पहली समानता ये है कि दोनों ही पुलिसकर्मी हैं, शेन बॉन्ड जब क्रिकेट नहीं खेलते तब न्यूज़ीलैंड के कैंटरबरी में यही काम करते हैं.

और सुनीता रानी पंजाब पुलिस में डीएसपी के तौर पर फ़ुल टाइम नौकरी कर रही हैं.

मज़े की बात तो ये है कि अब मोहाली में हो रहे चैंपियंस ट्रॉफ़ी के मैच से जुड़े इन दोनों पुलिस वालों को एक साथ ले आए हैं.

बुधवार को जब न्यूज़ीलैंड की टीम मोहाली में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैदान पर थी तो स्टेडियम के बाहर सुनीता रानी सुरक्षा का ज़िम्मा संभाल रही थीं.

उन्होंने बीबीसी को बताया,"मुझे ख़ुशी है कि मुझे ये ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. पहले जब मैं एथलीट थी तो मेरी सुरक्षा कोई और करता था लेकिन अब खिलाड़ियों की देखरेख करना अच्छा लगता है."

वे कहती हैं कि "कभी-कभी डंडा चलाना और मुश्किल खड़ी कर रहे लोगों की पिटाई करने में भी मज़ा आता है."

लेकिन रेसिंग ट्रैक पर घंटों हवा से बातें करने वाली ये छरहरी पंजाबी युवती कभी-कभी वर्दी पहने पुलिस स्टेशन में बैठे बैठे बोर हो जाती हैं.

वे कहती हैं,"पुराने दिनों की याद आती है जब कोई रोक टोक नहीं होती थी और मैं 15-20 किलोमीटर के चक्कर लगाया करती थी. कभी-कभी तो इतनी घुटन होती है कि मैं अपने बॉस को फ़ोन करके बहाना बना देती हूँ कि पेट में दर्द है, सिर में दर्द है या बुख़ार है और दफ़्तर जाती ही नहीं, और फिर छुट्टी लेकर दौड़ लगाने चली जाती हूँ."

ये पूछे जाने पर कि अगर कभी चोरी पकड़ी गई तो, इस पर वे कहती हैं,"मैं सावधान रहती हूँ और जब भी ऐसा करती हूँ, दौड़ लगाने ऐसी जगह जाती हूँ जहाँ कोई पुलिस वाला न देखे.और अगर मेरे बॉस ने देख भी लिया तो भी आपको लगता है वो मुझे पकड़ पाएँगे."

सौतेला बर्ताव

सुनीता कभी देश की सबसे मशहूर एथलीटों में से एक थीं लेकिन आज पुलिस में नौकरी कर रही हैं. वे कहती हैं, "क्रिकेटरों को इतना कुछ मिलता है लेकिन बाक़ी खेल खेलने वाले खिलाड़ियों को कुछ भी नहीं.इस बारे में सरकार और खेल से जुड़े अधिकारियों को कुछ करना चाहिए वरना देश में इन खेलों की हालत बिगड़ती ही जाएगी."

बाक़ी पुलिस वालों की तरह सुनीता रानी को भी ये काम बहुत थका देता है और उन्हें अपने लिए समय ही नहीं मिलता.

उन्हें दौड़ना छोड़े चार साल हो चुके हैं लेकिन वो कहती हैं अब भी अगर दस-पंद्रह दिन दौड़ लगा लूँ तो ऐसा लगता है वही पुराने दिन लौट आए हैं.

मुझे लगता है मैं अब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए कुछ कर सकती हूँ इसलिए ट्रैक पर वापसी की योजना बना रही हूँ.

साथ ही सुनीता को एक जीवन साथी की तलाश है.वे कहती हैं, "अभी तक अपने लिए समय ही नहीं मिला लेकिन अब घर बसाना चाहती हूँ. उनका मानना है कि शादी के बाद भी नौकरी और खेल पर ध्यान दिया जा सकता है."