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गुरुवार, 14 सितंबर, 2006 को 17:40 GMT तक के समाचार

विधांशु कुमार
कुआलालंपुर से

'रनों के साथ जीत भी होती तो अच्छा था'

लंबे समय बाद मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लौटे और पहले ही मैच में कमाल की बल्लेबाज़ी की.

हालांकि भारत अधूरे रहे मैच में तकनीकी आधार पर हार गया लेकिन सचिन के खेल का लोगों ने भरपूर आनंद लिया.

बीबीसी से बातचीत में सचिन ने कहा कि अगर रनों के साथ जीत भी होती है तो अच्छा था, इससे आत्मविश्वास अलग ही होता है.

सचिन लगभग सात महीने बाद आप बेहतरीन पारी खेल रहे थे लेकिन नतीजा मन मुताबिक नहीं आ पाया?

हाँ, पारी तो अच्छी रही लेकिन हम जीत नहीं पाए इसका काफ़ी अफ़सोस हो रहा है. बारिश की वजह से खेल को रोकना पड़ा लेकिन अभी भी 'चांस' है. इस टूर्नामेंट में तो हम पूरी कोशिश करेंगे.

पिच पर बैटिंग कैसी रही काफी गेंदे नीची रह रही थी. मुश्किल थी बैटिंग फिर भी आपने काफी आक्रामक रुख़ दिखाया?

हाँ, पिच में एक खड्डा सा था और उसमें कई गेंदे उछल रही थीं. काफी बॉल नीचे भी रह रहीं थीं. इसमें थोड़ा मुश्किल तो था. लेकिन प्लानिंग अच्छी हुई और मैं खुश हूँ कि जो प्लालिंग दिमाग में थी वह रन में दिखाई पड़ी.

ऑपरेशन के बाद आपके कंधे फिर से मजबूत हुए हैं. बिलकुल विंटेज सचिन हमको देखने को मिला.

कोशिश तो हमेशा वैसी ही होती है लेकिन कभी-कभी टीम का प्लान अलग होता है. कभी-कभी हमें बताया जाता है कि हमें अलग खेलना है तो उस हिसाब से खेलते हैं. ये किसी अकेले खिलाड़ी का खेल तो है नहीं कि जैसा आप चाहें वैसा खेलें. हर टीम प्लान करती है कि कौन बल्लेबाज़ बड़े शॉट्स खेलेंगे और कौन बल्लेबाज़ पूरे 50 ओवर बैटिंग करने की कोशिश करेंगे.

चालीसवें शतक का अहसास कैसा है?

40वां शतक एक नंबर है. लेकिन उसी के साथ अफसोस है कि मैच पूरा नहीं हुआ और हम जीत नहीं पाए. मैं हमेशा यही कहना चाहूँगा कि जब रन होते हैं और जीतते हैं तो उसका आत्मविश्वास अलग होता है.