गुरुवार, 14 सितंबर, 2006 को 18:38 GMT तक के समाचार
सैयद किरमानी
पूर्व क्रिकेटर
कप्तान द्रविड़ ने टॉस जीतकर बल्लेबाज़ी का फैसला जो किया वह एक हद तक कामयाब रहा. सलामी बल्लेबाज़ों की तरह फिर द्रविड़ ने तेंदुलकर का साथ दिया.
पहले विकेट की साझीदारी अच्छी रही.
दूसरी विकेट की काफी अच्छी और लंबी साझीदारी रही सचिन और फिर से मेक-शिफ्ट इरफान पठान के बीच. इस साझीदारी का हाइप्वाइंट रहा दोनों खिलाड़ियों की वापसी.
सचिन घायल होने के बाद से पहली बार लौटे तो इरफ़ान वेस्टइंडीज में खराब फ़ॉर्म के बाद. दोनों ने मिलकर काबिले तारीफ पारी खेली.
खासतौर से सचिन का प्रदर्शन बहुत ही आलीशान रहा. 141 रन बनाकर नॉट-आउट रहे सचिन अपने जवानी के दिन वापस नज़र आते दिखे.
पिच में असंतुलित बाउंस होने की वजह से सहवाग और धोनी लंबी पारी खेल नहीं पाए क्योंकि ऐसी पिच पर सेट होना हर बल्लेबाज़ को ज़रूरी होता है.
खतरनाक गेंदों से तभी बचा जा सकता है जब बल्लेबाज़ सेट होता है और क़िस्मत भी साथ हो.
रैना और सचिन की आला सचिन की साझेदारी रही जिसकी बदौलत भारत ने 310 रन जोड़े. कोई भी टीम 300 से ऊपर बनाती है तो यह जीतने का टोटल होता है मगर क्रिकेट ऐसा खेल है कि कुछ भी हो सकता है. जैसे साउथ अफ्रीका ने इतिहास रचा था.
भारतीय गेंदबाज़ी कमज़ोर
वेस्टइंडीज की शुरूआत क्रिसगेल और शिवनारायण चंद्रपाल ने की. इन दोनों सलामी बल्लेबाज़ों ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ पिछले मैच में बेहतरीन शतक की साझेदारी की थी.
भारत के ख़िलाफ़ यही जोड़ी जम नहीं पाई. गेल 40 रन पर आउट हो गए. लारा और रामनरेश श्रवण जो कई मैच वेस्टइंडीज को जीता चुके हैं, भारत की गेंदबाज़ी हावी होते नज़र आए.
और जब बारिश ने खेल को आगे बढ़ने से रोक दिया. 141 पर दो विकेट खोते हुए 20 ओवर पर खेल रोक दी गई.
भारतीय गेंदबाज़ों ने मेरे ख्याल से उतनी अच्छी गेंदबाज़ी नहीं की.
20 ओवर आते-आते अच्छी लाइन लेंथ डालनी चाहिए थी, जो भारतीय गेंदबाज़ नहीं डाल पाए और जिसका फायदा वेस्टइंडीज के बल्लेबाज़ लारा और श्रवन ने उठाया.
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये लोग रन रेट कंट्रोल नहीं कर पाए जिसकी बदौलत डकवर्थ लुइस का फार्मूला लागू किया गया.
मेरे नज़रिए से तो यह बराबरी का मैच था. कोई भी मैच जीत सकता था क्योंकि क्रिकेट में कुछ कहा ही नहीं जा सकता.
जहाँ तक भारतीय टीम की कमज़ोरी का सवाल है तो हर क्षेत्र में हर कोई कामयाब नहीं हो सकता.
सारा दारोमदार आपके अच्छे फार्म पर निर्भर करता है. हर कोई बॉलर पांच विकेट के ऊपर लेने की कोशिश में रहता है. हर बल्लेबाज़ शतक के नज़रिए से बैटिंग के लिए जाता है.
और सचिन को अब कुछ भी साबित करने की ज़रूरत नहीं है. उन्होंने इतनी बेहतरीन पारी खेली.
फिटनेस दिखाई. हर किस्म के स्ट्रोक्स खेले. इससे आगे और क्या बताना चाहिए. जब वे आउट हो जाते हैं तो उनकी आलोचना शुरू हो जाती है.
सचिन हर बार ऐसी पारी नहीं खेल सकते, हर बार सेंचुरी नहीं लगा सकते.