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गुरुवार, 20 जुलाई, 2006 को 23:36 GMT तक के समाचार

पंकज प्रियदर्शी
बीबीसी संवाददाता, लंदन

चयन प्रक्रिया पर सवाल क़ायम

एक दिवसीय सिरीज़ में ख़राब प्रदर्शन के बाद एक बार फिर भारतीय टीम एक दिवसीय मैचों में अपना दबदबा साबित करने श्रीलंका के लिए रवाना होने वाली है.

चयनकर्ताओं ने तमाम अटकलों के बावजूद ज़्यादातर उन्हीं खिलाड़ियों में भरोसा दिखाया है, जिनके लुंज-पुंज प्रदर्शन के कारण भारतीय टीम को वेस्टइंडीज़ के हाथों क़रारी मात मिली थी.

भारतीय टीम में मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की वापसी तो हुई है. लेकिन टेस्ट मैचों में भारत के संकट मोचक बनकर सामने आए अनिल कुंबले को अभी भी वनडे मैचों के लायक नहीं समझा गया.

चयनकर्ताओं ने इंग्लिश काउंटी क्रिकेट में अच्छे प्रदर्शन के कारण दिनेश मोंगिया को तो जगह दी है लेकिन वहीं काउंटी में बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद ज़हीर ख़ान चयनकर्ताओं का दिल नहीं जीत पाए.

हरभजन सिंह और इरफ़ान पठान ने वेस्टइंडीज़ में काफ़ी ख़राब प्रदर्शन किया था. लेकिन वे भी टीम में जगह बनाने में सफल रहे हैं.

मध्य क्रम के लिए मोहम्मद कैफ़ और सुरेश रैना के साथ-साथ युवराज सिंह पर भी भरोसा किया गया है.
तेज़ गेंदबाज़ी की कमान संभालेंगे इरफ़ान पठान, मुनाफ़ पटेल, श्रीसंत और रूद्र प्रताप सिंह. जबकि हरभजन सिंह और रमेश पवार स्पिन आक्रमण संभालेंगे.

वेस्टइंडीज़ के दौरे से जिन दो खिलाड़ियों का पत्ता साफ़ हुआ है- वे हैं रॉबिन उथ्थपा और वेणुगोपाल राव.

इन दोनों खिलाड़ियों को क्यों बाहर किया गया- इसका जवाब शायद चयनकर्ता भी स्पष्ट शब्दों में न दे पाए.

इन दोनों खिलाड़ियों को सिर्फ़ एक-एक मैच में ही मौक़ा दिया गया. उथप्पा तो अपना खाता भी नहीं खोल पाए जबकि वेणुगोपाल राव ने 11 रन बनाए.

अब जिस आधार पर मोहम्मद कैफ़ और युवराज सिंह को इतने दिनों टीम में रखा गया, उस आधार पर इन दोनों खिलाड़ियों को भी अपने को साबित करने का मौक़ा तो मिलना ही चाहिए था.

ख़ैर, ऐसा नहीं हुआ.

वापसी तो तय थी

क़रीब छह महीनों बाद सचिन तेंदुलकर की टीम में वापसी हुई है.

सचिन की वापसी उस समय से तय मानी जा रही थी, जब लैशिंग्स क्रिकेट क्लब की ओर से चैरिटी मैचों में उनका बल्ला जम कर बोल रहा था.

सचिन की वापसी से भारत की बल्लेबाज़ी मज़बूत होगी- इससे शायद ही किसी को इनकार होगा.

सचिन और सौरभ गांगुली के बाद अगर वनडे मैच में कोई सलामी जोड़ी ख़तरनाक मानी जा सकती है तो वो है सचिन और सहवाग की.

आईसीसी चैम्पियंस ट्रॉफ़ी से पहले दोनों खिलाड़ी अपने लय-ताल में आ जाएँ, तो भारत के लिए बेहतर होगा.

रही बात मध्यक्रम की, तो चयनकर्ताओं ने एक बार फिर उन्हीं खिलाड़ियों पर भरोसा किया है.

यानी मोहम्मद कैफ़, युवराज सिंह और सुरेश रैना पर. वेस्टइंडीज़ में भारत की ओर से मोहम्मद कैफ़ ने प्रदर्शन तो ठीक-ठाक ही किया.

लेकिन उन्होंने किसी भी मैच में प्रभावित नहीं किया. युवराज सिंह ने भी 45 से ज़्यादा की औसत से रन बनाए लेकिन उनमें भी वो बात नहीं थी, जो पहले रहती थी.

सुरेश रैना ने तो निराश ही किया था. अब दिनेश मोंगिया की टीम में वापसी हुई है. कहा जा रहा है कि काउंटी में उनके प्रदर्शन को आधार मान कर टीम में उन्हें लिया गया.

सवाल हैं कई

लेकिन इसी आधार पर ज़हीर ख़ान को टीम में जगह क्यों नहीं मिली, इसका जवाब चयनकर्ताओं को देना मुश्किल पड़ेगा.

गेंदबाज़ी में हरभजन सिंह को टीम में जगह मिली है. लेकिन वेस्टइंडीज़ में उनके प्रदर्शन के बारे में कुछ न ही कहा जाए तो बेहतर होगा.

पाँच मैचों में उन्हें सिर्फ़ तीन विकेट मिले. अनिल कुंबले इस बार बड़े दावेदार थे. उन्होंने टेस्ट मैच में अपने बल्ले का भी कमाल दिखाया था. लेकिन उन्हें जगह क्यों नहीं दी गई.

इसका जवाब देना भी चयनकर्ताओं को मुश्किल पड़ सकता है. तर्क ये है कि विश्व कप की तैयारी की जा रही है.

लेकिन परिवर्तन की मिसाल बन चुके, कोच ग्रेग चैपल चयनकर्ताओं को न मना पाए या टीम के चयन में उनकी भी हाँ थी. ये तो नहीं पता.

लेकिन इतना तो ज़रूर पता है कि बदलाव, कभी बहुत बदलाव, कभी एक ख़राब प्रदर्शन के बाद टीम से छुट्टी तो कभी लगातार ख़राब प्रदर्शन के बावजूद टीम में स्थान क़ायम- टीम प्रबंधन की कोई स्थायी नीति नहीं नज़र आती.

अगर लगातार ऐसा होता रहा, तो इसका नुक़सान टीम को विश्व कप में उठाना पड़ सकता है.