रविवार, 09 जुलाई, 2006 को 22:24 GMT तक के समाचार
पंकज प्रियदर्शी
बीबीसी संवाददाता
विश्व कप फ़ुटबॉल का फ़ाइनल मैच देखने का एक अलग उत्साह रहता है. चार साल बाद आने वाले इस खेल पर्व का इंतज़ार मुझे उसी दिन से था जब 2002 के फ़ाइनल में ब्राज़ील ने जर्मनी को हराकर पाँचवीं बार ख़िताब जीता था.
इस बार ब्राज़ील की टीम विश्व कप के फ़ाइनल में नहीं पहुँची और अर्जेंटीना की टीम भी अच्छे प्रदर्शन के बावजूद क्वार्टर फ़ाइनल के बाद ही स्वदेश लौट गई.
फ़्रांस के शुरुआती मैचों के आधार पर शायद ही किसी को अंदाज़ा था कि फ़्रांस की टीम फ़ाइनल तक का सफ़र तय कर पाएगी.
लेकिन अपने अनुभवी खिलाड़ियों के दम पर जब फ़्रांस ने ब्राज़ील को धूल चटाई तो लगा फ़्रांस में दम लौट आया है.
ऐसा दम जो 1998 में देखने को मिला था. जब फ्रांस की टीम फ़ाइनल में पहुँची तो उसे ख़िताब का प्रबल दावेदार माना जाने लगा. मुक़ाबला था इटली से. ऐसी टीम जिसके ज़्यादातर खिलाड़ी मैच फ़िक्सिंग के आरोपों से जूझ रहे थे.
लेकिन फ़ाइनल में इटली ने शुरुआत काफ़ी अच्छी की. जर्मनी के ख़िलाफ़ सेमी फ़ाइनल में बेहतरीन जीत हासिल करने वाली इटली की टीम का मनोबल देखते ही बन रहा था.
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ज़िदान पर नज़र
फ़ाइनल में आँखें टिकी थी फ़्रांस के कप्तान ज़िनेदिन ज़िदान पर. जिनके लिए ये मैच आख़िरी मैच था. विश्व कप की ख़िताबी जीत से बढ़कर उपहार क्या हो सकता था.
ऐसा खिलाड़ी, जिसने अपने फ़ुटबॉल करियर ने क्या-क्या नहीं हासिल किया. प्रशंसा, पुरस्कार और सम्मान.
फ़ाइनल में पेनल्टी पर पहला गोल करते समय ज़िदान का संयम देखते बन रहा था. मैदान पर एक बार फिर ज़िदान की कला का जलवा दिखा. वैसे इटली ने भी अच्छी चुनौती दी.
एक समय तो ऐसा लगा कि कंधे की चोट के कारण इस खिलाड़ी को समय से पहले ही मैदान छोड़ देना पड़ेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ज़िदान का जीवट उन्हें मैदान पर ले आया और फिर से वे दौड़ पड़े अपने देश को ख़िताब दिलाने के लिए.
अतिरिक्त समय में तो उन्होंने अपनी टीम के लिए ख़िताबी गोल मार ही दिया था. लेकिन उनके शानदार हेडर पर इटली के गोलकीपर बुफ़ोन ने बेहतरीन बचाव किया.
अब लग रहा था कि मैच पेनल्टी शूट आउट में जाएगा और हुआ भी यही. लेकिन इसके पहले ज़िदान के साथ जो हुआ. उसने एकबारगी फ़ाइनल मैच का उत्साह ही कम कर दिया.
टीवी रिप्ले में दिखा कि किस तरह ज़िदान ने अपने सिर से मैतरात्सी के सीने पर प्रहार किया और फिर मैतरात्सी गिर पड़े. कई मिनट की बहस के बाद रेफ़री ने सहायक रेफ़री से सलाह ली और ज़िदान को रेड कार्ड दिखाया गया.
लाखों प्रशंसकों के चेहरे की भाव-भंगिमा बदल गई. स्टेडियम में भी एकाएक माहौल बदल गया और इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने जैसे विश्व कप फ़ाइनल पर अपनी छाया छोड़ दी.
ज़िदान के बाहर जाने के बाद फ़्रांस की टीम हताश हो उठी और पेनल्टी शूट आउट में हार गई. साथ ही विश्व कप के साथ अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल को अलविदा कहने का ज़िदान का सपना भी टूट गया.
जिन लोगों ने भी ज़िदान को मैदान पर खेलते देखा है, वो चाहे फ़्रांस की तरफ़ से अंतरराष्ट्रीय मैच हो या फिर क्लब फ़ुटबॉल- सभी उनके संयम की दाद देते नहीं थकते.
मैतरात्सी से उनकी किस बात पर झड़प हुई, मैतरात्सी ने उन्हें क्या कहा, जिससे ज़िदान इतने भड़क गए. सवाल कई है. शायद इनका जवाब तलाशने में समय लगे. लेकिन इस जानदार खिलाड़ी की ऐसी विदाई की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी.