रविवार, 02 जुलाई, 2006 को 04:23 GMT तक के समाचार
मुकेश शर्मा
बीबीसी हिंदी संवाददाता
बुढ़ापे और टीम को प्रेरित नहीं कर पाने के आरोप झेल रहे ज़िनेदिन ज़िदान के ब्राज़ील के विरुद्ध प्रदर्शन ने एक बार फिर उन्हें अद्वितीय प्रतिभा के खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत किया है.
इस फ़ुटबॉल विश्व कप का कोई भी मैच उनका आख़िरी मैच हो सकता था क्योंकि उन्होंने इस विश्व कप के बाद अलविदा कहने का फ़ैसला कर लिया है, मगर फ़ुटबॉल प्रेमियों को अभी मैदान पर उनके जौहर देखने का मौक़ा और मिलेगा.
ज़िदान के नेतृत्त्व में विश्व कप में उतरी फ़्रांस की टीम सबसे बूढ़ी मानी जा रही है और ख़ुद फ़्रांस में ही इस टीम को देश की मौजूदा स्थिति को सामने लाने वाली टीम बताया जा रहा था.
फ़्रांस के अख़बार लिख रहे थे कि ये टीम देश के ही अनुरूप बूढ़ी टीम है, जिसमें एकजुटता नहीं है और आगे बढ़ने का उत्साह भी नहीं है.
मगर ज़िदान ने ब्राज़ील के विरुद्ध जिस तरह का प्रदर्शन किया और टीम को उस प्रदर्शन से प्रेरित किया उसी का नतीजा था कि फ़्रांस की जीत के बाद राजधानी के प्रमुख क्षेत्र शॉन्ज़ एलीज़ें में हज़ारों लोग ख़ुशियाँ मनाने निकल पड़े.
ख़ुशियाँ ऐसी कि मानो टीम ने विश्व कप ही जीत लिया हो, मगर जब उम्मीद काफ़ी कम हो तो हर सफलता शायद ऐसी ही प्रतिक्रिया सामने लाती है. उसका श्रेय ज़िदान के प्रदर्शन को ही दिया जा सकता है, जिसने न सिर्फ़ अपनी टीम के खिलाड़ियों को प्रेरित किया बल्कि विपक्षी टीम के खिलाड़ी भी उनके प्रदर्शन के क़ायल नज़र आए.
सब पर भारी
दस नंबर की जर्सी पहने ज़िदान विपक्षी टीम में दस नंबर की जर्सी पहने और वर्ष के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रोनाल्डीनियो पर कहीं भारी पड़े.
जिस शांत और सहज तरीक़े से ज़िदान खेल रहे थे, ऐसा लगा कि वे मैदान पर मौजूद बाक़ी खिलाड़ियों को सिखा रहे हों कि तनाव के मौक़े पर भी संयम बनाए रखते हुए कमाल का प्रदर्शन कैसे किया जा सकता है.
फिर वो ज़िदान के मूव रहे हों, उनके पास रहे हों या गेंद को अपनी जाँघ से रोककर आगे बढ़ा देने की बेहतरीन कला लोग मंत्रमुग्ध होकर खेल देख रहे थे और शायद एक पल को भी नहीं लगा कि ज़िदान 34 वर्ष के एक ऐसे खिलाड़ी हैं, जो किसी भी मैच के बाद मैदान से अलविदा कहने वाले हैं.
ज़िदान का ये बेहतरीन अंदाज़ वैसे स्पेन के विरुद्ध पिछले मैच में ही दिखने लगा था जबकि उनकी फ़्री-किक पर विएरा ने गोल किया और उसके बाद उन्होंने बेहतरीन शॉट लगाकर बॉल को गोलपोस्ट में पहुँचा दिया था.
जीत के नायक
ब्राज़ील के विरुद्ध मैच भावनात्मक रूप से भी काफ़ी अहम था क्योंकि 1998 में पेरिस में विश्व कप के फ़ाइनल में फ़्रांस ने ही ब्राज़ील को हराया था और उस जीत के महानायक थे ज़िनेदिन ज़िदान.
उस हार के बाद से ब्राज़ील की टीम विश्व कप में एक भी मैच नहीं हारी थी और इस मैच से पहले ये सोचना भी मुश्किल लग रहा था कि रोनाल्डो, रोनाल्डीनियो और काका जैसे माहिर खिलाड़ियों से सजी टीम को फ़्रांस की टीम टक्कर भी दे पाएगी.
मगर फ़्रांस की टीम ने न सिर्फ़ टक्कर दी बल्कि मैकालेले, रिबेरी, ऑनरी और उन सबके ऊपर ज़िदान ने फ़्रांस को एक योग्य विजेता के रूप में सामने रखा.
पहले हाफ़ से पहले ली गई ज़िदान की फ़्री किक और फिर उसके बाद दूसरे हाफ़ में उनकी फ़्री किक ने दिखाया कि ज़िदान के खेल में सिर्फ़ गति ही नहीं बल्कि एक कला और कौशल भी है.
उनकी जिस चतुराई भरी फ़्री-किक पर थिएरी ऑनरी ने विजयी गोल किया और उसके बाद जिस तरह ज़िदान ने ब्राज़ीलियाई खिलाड़ियों को छकाया उसने फिर दिखा दिया कि ज़िदान में अभी काफ़ी खेल बाक़ी है और वह इस मैच के ऐसे ‘मैन ऑफ़ द मैच’ थे जिनके इर्द-गिर्द भी कोई खिलाड़ी नहीं टिक सका.