बुधवार, 21 जून, 2006 को 22:28 GMT तक के समाचार
पीएम तिवारी
कोलकाता से
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की एक टिप्पणी से लगता है बंगाल क्रिकेट के बेताज बादशाह रहे जगमोहन डालमिया के लिए कठिन समय आ गया है.
लग रहा है कि क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बंगाल नाम का आख़िरी किला भी उनके हाथ से फिसलने वाला है.
बीसीसीआई में उनके पक्ष को मिली पराजय के बाद उन्हें अनियमितता के आरोपों का जवाब देना पड़ रहा है और मुकदमा झेलना पड़ रहा है.
भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के प्रमुख रहे डालमिया बीते 14 वर्षों से क्रिकेट एसोसिएशन आफ बंगाल (सीएबी) के अध्यक्ष पद पर हैं.
लेकिन मुख्यमंत्री भट्टाचार्य ने इस सप्ताह कहा कि वे नहीं चाहते कि डालमिया इस बार अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ें.
उन्होंने कहा कि ‘सौरव को अब बड़ी भूमिका निभानी होगी.’ हालांकि उन्होंने इसका मतलब नहीं बताया.
भट्टाचार्य की इस टिप्पणी के एक दिन पहले ही कोलकाता के पुलिस प्रमुख प्रसून मुखर्जी ने अध्यक्ष पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का एलान किया था.
सीएबी के चुनाव जुलाई के अंत में होने हैं.
कठिन समय
भारतीय क्रिकेट टीम में सौरव गांगुली की क़िस्मत चमाकाने में डालमिया की भूमिका पर किसी को संदेह नहीं होगा.
लेकिन अब लगता है किस्मत सौरव से जुड़ गई है.
बीते साल सौरव से पहले कप्तानी छीनने व फिर टीम से उनकी छुट्टी के बाद डालमिया का कठिन समय शुरू हो गया है.
मुख्यमंत्री के निर्देश पर खेल मंत्री सुभाष चक्रवर्ती ने बुधवार को डालमिया से मुलाक़ात कर उनको भट्टाचार्य की इच्छा से अवगत करा दिया.
चक्रवर्ती कहते हैं, "चुनाव लड़ने या नहीं लड़ने का फैसला डालमिया को ही करना है. मैंने तो उनको मुख्यमंत्री की इच्छा से अवगत करा दिया है."
जिस सौरव गांगुली के समर्थन में डालमिया ने आईसीसी तक से दो-दो हाथ किया था, उनका परिवार भी अब डालमिया के खिलाफ़ हो गया है.
सौरव के पिता चंडी गांगुली से डालमिया के बहुत पुराने संबंध रहे हैं. चंडी भी सीएबी के पदाधिकारी व संरक्षक रहे हैं.
सौरव के बड़े भाई स्नेहाशीष गांगुली कहते हैं, "सौरव की मौजूदा स्थिति के लिए डालमिया ही जिम्मेवार हैं. सौरव समेत हमारा पूरा परिवार प्रसून मुखर्जी के साथ है. क्रिकेट व क्रिकेटरों के हित में अब सीएबी में बदलाव ज़रूरी है."
इंग्लैंड में काउंटी खेल रहे सौरव ने भी प्रसून की उम्मीदवारी का समर्थन किया है.
माकपा की राजनीति
डालमिया के समर्थन व विरोध के सवाल पर माकपा की अंतरकलह भी सतह पर आ गई है.
डालमिया को पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु का करीबी समझा जाता है.
उधर ज्योति बसु ने प्रसून मुखर्जी की उम्मीदवारी पर नाराज़गी जताते हुए कहा है, "पुलिस प्रमुख का पद काफी जिम्मेवारी भरा है. वे खेल को कितना समय दे पाएँगे, यह कहना मुश्किल है."
लेकिन बसु से मुलाकात करने गए डालमिया को मंगलवार को खाली हाथ ही लौटना पड़ा. बीमार होने के कारण बसु ने उनसे मुलाकात नहीं की.
जानकार लोगों का कहना है कि कलकत्ता चमड़ा परिसर परियोजना के मुद्दे पर राज्य सरकार व डालमिया के संबंधों में कटुता आई है.
कहा जाता है कि ज्योति बसु के कार्यकाल में तमाम नियमों को ताक पर रख कर डालमिया की कंपनी को यह परियोजना सौंपी गई थी.
इसके अलावा राज्य के ज्यदातार लोग सौरव गांगुली की टीम से छुट्टी के लिए डालमिया को ही जिम्मेवार मानते हैं.
सौरव के क़रीबी राज्य के नगर विकास मंत्री अशोक भट्ट्चार्य कहते हैं, "सौरव की टीम से छुट्टी के लिए डालमिया ही जिम्मेवार हैं."
क्रिकेट संगठन के चुनाव के मामले में मुख्यमंत्री के इस हस्तक्षेप की आलोचना भी हो रही है.
जाने-माने पत्रकार वरुण सेनगुप्ता कहते हैं, "खेल के मामले में मुख्यमंत्री का यह हस्तक्षेप उचित नहीं है. राजनीति में खेल भले होते हों, खेल को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए."
डालमिया चुप
दूसरी ओर, डालमिया ने अब तक इस मामले पर चुप्पी साध रखी है.
शायद वे हवा का रुख भांप रहे हैं.
लेकिन एक जुझारू क्रिकेट प्रशासक की छवि वाले डालमिया इतनी आसानी से हार मान लेंगे. कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है.
महानगर के विभिन्न क्लबों पर उनकी बहुत मजबूत पकड़ है.
बीते साल राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक दिनेश चंद्र वाजपेयी ने भी डालमिया के खिलाफ चुनाव लड़ा था. लेकिन उनको 118 में से महज 14 वोट ही मिल सके थे. हालांकि तब मुख्यमंत्री ने डालमिया का विरोध नहीं किया था.
चुनाव का नतीजा चाहे जो भी हो, डालमिया को क्रिकेट प्रशासक के तौर पर अपने लंबे कार्यकाल में पहली बार घर में ही मिलने वाली कड़ी चुनौतियों से जूझना पड़ा रहा है.