गुरुवार, 17 नवंबर, 2005 को 13:27 GMT तक के समाचार
एस नियाज़ी
भोपाल
भारत में मुस्लिम महिलाएँ आज भी बड़ी संख्या में पर्दे के पीछे रहने को मजबूर हैं, मगर भोपाल की फ़ातिमा बानो की प्रतिभा को देखकर ऐसा लगता है मानो कि वो अपना अलग मुक़ाम बनाने के लिए संकल्पबद्ध हैं.
फ़ातिमा ये कुश्ती का प्रशिक्षण स्कूल चलाकर बनाने की कोशिश कर रही हैं.
कुश्ती वैसे भी ऐसा खेल है जिसमें महिलाओं का जाना कोई बहुत अच्छी बात नहीं मानी जाती.
31 साल की फ़ातिमा बानो देश की अकेली महिला हैं जो कोच के रूप में काम कर भोपाल के अखाड़ा ट्रेनिंग स्कूल में बच्चों को कुश्ती के दॉवपेंच सीखा रही हैं.
फ़ातिमा भी स्वीकार करती हैं कि कुश्ती जैसे खेल में आज भी महिलाओं को आगे आने पर परिवार से किसी तरह की मदद नहीं मिलती.
कठिन सफ़र
मध्यप्रदेश की तरफ़ से राष्ट्रीय खेलों में गोल्ड मेडल जीत चुकी फ़ातिमा के लिए कोच बनने तक का सफ़र आसान नहीं रहा है.
चार बहनों और एक भाई में तीसरे नंबर की फ़ातिमा को सबसे पहले अपने घर वालों की तरफ़ से ही विरोध का सामना करना पड़ा.
बचपन से ही फ़ातिमा को खेलों का शौक रहा है. पहले वे कबड्डी में तीन बार राष्ट्रीय स्तर पर भी खेल चुकी हैं.
उनके खेल को देखकर उनके कोच ने ही उन्हें कुश्ती में आने की सलाह दी जिसके बाद वह इसे सिखाने भी लगीं, हालाँकि घर वालों को उनकी बेटी का मर्दो के इस खेल में आना पसंद नहीं था.
काफ़ी विरोध के बाद उन्हें घर का भी सहयोग मिला जिसके बाद 1997 में उन्होंने पटियाला जाकर बाक़ायदा कुश्ती की ट्रेनिंग ली और उसके बाद अलग-अलग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का दौर चल पड़ा.
इतने सालों की मेहनत तो है लेकिन उन्हें सरकार से कोई मदद उन्हें नहीं मिलती. इसी की वजह से फ़ातिमा के पिता सैयद नासिर उल्लाह अब अपनी बेटी को इस खेल से अलग करना चाहते हैं.
उनका कहना है, "इस खेल में फ़ातिमा ने कमाया तो कुछ भी नहीं बल्कि अपनी जेब से ही पैसे लगाए हैं."
उनके पिता चाहते हैं कि फ़ातिमा अपनी दूसरी बहनों की तरह घर बसाएँ.
छोटे भाई सलीम का कहना है कि सरकार कुश्ती की जिस तरह अनदेखी करती है उसकी वजह से ही बच्चे इस खेल की तरफ़ नहीं जाना चाहते.
प्रशिक्षण
फ़ातिमा ने कुश्ती के दॉवपेंच अपने कोच शाकिर नूर से सीखे, जिनका मानना है कि इंसान का जज़्बा उसे किसी भी चीज़ को पाने में मदद करता है.
फ़ातिमा ने दो साल पहले प्रशिक्षण देना शुरु किया था. उनके पास इस वक़्त 10 बच्चे कुश्ती सीख रहे हैं.
फ़ातिमा से कुश्ती सीखने वाले उन्हें एक अच्छा उस्ताद मानते हैं.
उनके छात्र आबिद का कहते हैं, "मैंने फ़ातिमा से न सिर्फ़ कुश्ती के विभिन्न तरीक़े सीखे बल्कि खेल की बारीकियों को भी जाना."
एक अन्य छात्र आसिफ़ का कहना है कि उन्होंने फ़ातिमा से कुश्ती की सैकड़ों तकनीकें सीखी हैं, जो उन्हें पहले कभी नहीं बताई गई थीं.
वह मानते हैं कि इस तरह की तकनीक उनके लिए न सिर्फ़ भारत में बल्कि बाहर के मुल्कों की कुश्ती में भी मददगार साबित होगी.
उनकी छात्रा आरती पहले तो अपने बचाव के लिए कुश्ती सीख रही थी. मगर अब वह कुश्ती के क्षेत्र में अपना और अपने देश का नाम कमाना चाहती हैं.
फ़ातिमा ने अमरीका, कज़ाख़्स्तान और किरगिस्तान में होने वाली प्रतियोगिताओं में बतौर कोच हिस्सा भी लिया है.
फ़ातिमा को खेलों के लिए दिए जाने वाले मध्य प्रदेश सरकार के सबसे बड़े सम्मान विक्रम अवार्ड से 2001 में सम्मानित किया जा चुका है.
मगर देश के दूसरे खिलाड़ियों की तरह वो भी पैसों की कमी का सामना कर रही है. उनको इस वक़्त चार हज़ार रूपए महीना मिलते हैं, जिसे वो नाकाफ़ी मानती हैं.
उनका कहना है कि ज़्यादा पैसे मिलें तो ज़्यादा अच्छी ट्रेनिंग अपने छात्रों को दे सकती हैं.
विरोध
अखाड़े में मुस्लिम महिला के इस वर्चस्व को मुस्लिम धर्मगुरू कोई बहुत अच्छी नज़र से नहीं देखते हैं.
नायब काज़ी अमोरूलाह कहते हैं, "औरतों को वही काम करना चाहिए, जो उनके मिजाज़ के हिसाब से हो. आज के वक़्त में मर्दों की बराबरी के लिए वे काम भी किए जा रहे हैं जो औरतों के लिए हैं ही नहीं."
लेकिन फ़ातिमा मानती हैं कि कुश्ती में लड़के और लड़कियों दोनों के लिए काफी गुंजाइश बाक़ी है.
वे कहती हैं, "ज़रूरत इस बात की है कि सीखने वालों में मेहनत करने का हौसला होना चाहिए और कुछ पाने की ख़्वाहिश, जो आज के वक़्त में कम ही देखी जाती है."
अब यह तो वक़्त ही बताएगा कि फ़ातिमा कितनी देर तक प्रवाह के विरूद्ध तैर पाती हैं.