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मंगलवार, 17 अगस्त, 2004 को 14:47 GMT तक के समाचार

देर लेकिन दुरुस्त आए राज्यवर्धन सिंह

एथेंस ओलंपिक खेलों में आज़ाद भारत का पहला व्यक्तिग रजत पदक जीतकर निशानेबाज़ राज्यवर्धन सिंह राठौर ने नया इतिहास रचा है.

एथेंस ओलंपिक के निशानेबाज़ी मुक़ाबले में भारत की पदक जीतने की उम्मीदें जब एक के बाद एक ख़त्म होती जा रही थी, उस समय राज्यवर्धन का निशाना सही लगा और पदक तालिका में भारत ने अपना नाम दर्ज करा लिया.

राज्यवर्धन से पहले स्वतंत्र भारत के लिए व्यक्तिगत मुक़ाबलों में सिर्फ़ तीन खिलाड़ियों ने पदक जीते थे.

1952 में हेलसिंकी ओलंपिक के कुश्ती मुक़ाबले में केडी जाधव ने, 1996 के अटलांटा ओलंपिक के टेनिस सिंगल्स में लिएंडर पेस ने और 2000 के सिडनी ओलंपिक के महिला भारोत्तोलन में कर्णम मल्लेश्वरी ने.

लेकिन इन तीनों खिलाड़ियों ने काँस्य पदक ही जीते थे.

सेना में काम

34 वर्षीय मेजर राज्यवर्धन सिंह राठौर ने जम्मू-कश्मीर में भी काम किया है.

भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के महासचिव रणधीर सिंह से रजत पदक हासिल करने के बाद मृदुभाषी राज्यवर्धन सिंह राठौर ने कहा, "हम सैनिकों का काम ही है देश का सिर गर्व से ऊँचा करना."

1998 में ही राठौर ने निशानेबाज़ी मुक़ाबले में भाग लेना शुरू किया था. जल्द ही उन्होंने इन मुक़ाबलों में अपना दमख़म दिखाना शुरू कर दिया.

कुछ साल पहले ही उन्होंने अखिल भारतीय मावलंकर चैंपियनशिप में हिस्सा लिया था जिसके बाद ही कोई खिलाड़ी राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भाग ले सकता है.

साइप्रस के विश्व चैंपियनशिप में काँस्य पदक जीतने के बाद ही उन्हें एथेंस ओलंपिक में खेलने का अवसर मिला. उन्हें वरीयता क्रम में तीसरा स्थान भी मिला.

कुछ दिन पहले ही राठौर ने यह बयान दिया था कि युद्ध के मैदान में निशाना लगाना आसान है लेकिन ओलंपिक में स्वर्ण के लिए निशाना लगाना मुश्किल है.

पिछले साल राठौर ने सिडनी विश्व कप में स्वर्ण पदक जीतकर की थी. इसके बाद राठौर ने अलग-अलग प्रतियोगिताओं में दो और स्वर्ण जीते.

इसलिए एथेंस ओलंपिक के पहले उनका मनोबल काफ़ी ऊँचा था. और अब राठौर ने इसे साबित करके भी दिखा दिया है.