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क्रिकेट से बेहतर क्या....

राजनीति और खेल या फिर कूटनीति और खेल. इसका संबंध हमेशा से दाल और नमक का रहा है यानी रिश्ता है बड़ा गहन.

वो चाहे 1936 में हिटलर के समय के ओलंपिक खेल हों या 1980 के मॉस्को के ओलंपिक और उसका बहिष्कार.

या फिर दो वर्ष पूर्व भारत सरकार का ये कहना कि क्योंकि पाकिस्तान सरकार से संबध बिगड़े हैं इसलिए क्रिकेट मैदान पर भी मुलाक़ात नहीं होगी.

बहरहाल कूटनीति और खेल के इसी नज़दीकी संबंध के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट संबंध बहाल हो गए हैं.

रिकॉर्ड समय में संपन्न हो जाने वाली यह सिरीज़ इस सहस्राब्दि की इस प्रकार की पहली सिरीज़ है.

पाकिस्तान जाने वाले क्रिकेट प्रेमियों की होड़ लगी हुई है और यहाँ स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग को उस भीड़ से निपटने में अच्छी ख़ासी दिक़्कतें पेश आ रही हैं.

तैयारी

यह सिरीज़ तब हो रही है जब स्कूलों और कॉलेजों के छात्र परीक्षा की तैयारी में लगे हुए हैं और देश का बाक़ी प्रशासन तंत्र आम चुनाव की तैयारी में लगा हुआ है.

सचिन और शोएब के मुक़ाबले की चर्चा

उस लिहाज से देखा जाए तो इस सिरीज़ पर उतना ध्यान नहीं दिया जाएगा जितना उसे सामान्य समय पर मिलता.

लेकिन आम भारतीय और पाकिस्तानी नागरिकों के बीच यदि संपर्क को आसान करना है और यदि सरकारों के आपसी संबंधों को जनसाधारण के आपसी संबंधों से अलग रखना है तो ज़रूरी है कि रेलगाड़ी और बसों के रास्ते खोले जाएँ.

उससे भी ज़्यादा अगर दोनों देशों के लोगों के बीच रिश्तों को बढ़ाने का एक और मज़बूत आधार दिया जाना है तो खेल को बढ़ावा दिया जाए और क्रिकेट से बेहतर इसका क्या साधन हो सकता है.

क्रिकेट में वो आकर्षण है जो दोनों देशों के खेल प्रेमियों को दीवाना कर देता है.

हालाँकि परीक्षाओं और चुनावों के इस समय में हो सकता है कि तापमान ज़रा कम रहे लेकिन यह बहुत कम रहेगा ऐसा भी नहीं लग रहा है.

क्योंकि भारत में चीज़ों का दायरा सीमित नहीं रहता है सिर्फ़ अपने तक हर चीज़ साथ चलती है.

गर्मी, परीक्षाएँ, चुनाव और फ़सल कटाई के बाद दाम और भाव का आकलन करता किसान- इसमें सीमा पार चल रहा क्रिकेट भी शामिल हो जाए तो बुरा क्या है?