'बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवूमन 2022' के लिए वोटिंग बंद, विजेता का एलान 5 मार्च को

बीबीसी हर साल भारतीय खेल जगत से सर्वश्रेष्ठ महिला खिलाड़ियों को सम्मानित करता है. 2022 के इंडियन स्पोर्ट्सवूमन के लिए इस साल वोटिंग 6 फ़रवरी से शुरू हुई थी. इसमें पूरे देश और विदेश से बीबीसी के पाठकों, दर्शकों ने अपनी पसंदीदा महिला खिलाड़ी को चुनने के लिए वोट दिए.
बीबीसी ने वोटिंग शुरू करने के दिन, यानी 6 फ़रवरी को 5 खिलाड़ियों को नॉमिनेट किया था.
इस बार जिन खिलाड़ियों के बीच मुक़ाबला है, उनमें शामिल हैं वेटलिफ़्टर मीराबाई चानू. रेसलिंग से साक्षी मलिक और विनेश फोगाट जैसी पहलवान, बॉक्सिंग की दुनिया से निखत ज़रीन और बैडमिंटन खिलाड़ी पी.वी सिंधु.

इन पांच खिलाड़ियों में से एक विजेता का एलान अगले 'विश्व महिला दिवस' से पहले 5 मार्च को किया जाएगा.
2022 के बीबीसी इंडियान स्पोर्ट्सवूमन के लिए इन पांच खिलाड़ियों का चुनाव खेल की दुनिया से जुड़े लेखकों, पत्रकारों और दूसरे विशेषज्ञों के पैनल ने किया था.
आइए जानते हैं देश की इन पांच चर्चित खिलाड़ियों के बारे में विस्तार से.

'बीबीसी स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर' के ये पांच दावेदार
मीराबाई चानू
वेटलिफ़्टिंग चैंपियन मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलंपिक 2021 में सिल्वर मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनकर खेलों के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया.
इसके बाद उन्होंने वर्ल्ड वेटलिफ़्टिंग चैंपियनशिप 2022 में सिल्वर और बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में गोल्ड मेडल जीता.
2016 के रियो ओलंपिक खेलों में भार नहीं उठा सकने के बाद खेलों को लगभग अलविदा कर चुकी मीराबाई ने वहाँ से एक लंबा सफ़र तय किया है.
उन्होंने वर्ल्ड वेटलिफ़्टिंग चैंपियनशिप 2017 में गोल्ड मेडल जीत कर अपनी योग्यता साबित की.
देश के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में चाय बेचने वाले पिता के घर में पैदा हुई मीराबाई चानू को अपने खेल करियर के शुरुआती चरण में बहुत अधिक आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा.
लेकिन वे सभी बाधाओं को सफलतापूर्वक पार करती हुई चैंपियन बनीं. मीराबाई चानू पिछले वर्ष बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर का अवॉर्ड जीत चुकी हैं.
साक्षी मलिक
साक्षी मलिक ओलंपिक में मेडल जीतने वाली भारत की पहली महिला कुश्ती खिलाड़ी हैं.
उन्होंने 2016 के रियो ओलंपिक में 58 किलो भार वर्ग में कांस्य पदक हासिल करके यह इतिहास रचा था.
वे ओलंपिक मेडल जीतने वाली चौथी भारतीय महिला खिलाड़ीं बनी थीं.
साक्षी को हमेशा से खेलों में दिलचस्पी थी और जब ये पता चला कि उनके दादा भी एक पहलवान थे तो उन्हें इससे और प्रेरणा मिली.
रियो ओलंपिक में लाजवाब प्रदर्शन करने के बाद साक्षी का करियर एकदम से औंधेमुंह गिरा, लेकिन उन्होंने 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर चौंका देने वाली वापसी की.
साक्षी मलिक पहले भी कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत और कांस्य पदक जीत चुकी हैं.
विनेश फोगाट
कुश्ती में विनेश फोगाट दो वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं.
वे कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स दोनों में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान भी हैं.
विनेश कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार तीन गोल्ड मेडल हासिल कर चुकी हैं, हालांकि ये मेडल अलग-अलग वज़न वर्ग में आए थे. कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने बीते वर्ष 2022 में 53 किलो भार वर्ग में गोल्ड मेडल जीता था.
विनेश महिला पहलवानों के उस परिवार से आती हैं जहाँ उनकी चचेरी बहनें गीता और बबीता फोगाट ने भी कई अंतरराष्ट्रीय मेडल जीते हैं.
पीवी सिंधु
बैडमिंटन खिलाड़ी पुसरला वेंकट सिंधु (पीवी सिंधु) ओलंपिक खेलों में दो व्यक्तिगत मेडल हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं.
टोक्यो में मिला कांस्य उनका दूसरा ओलंपिक मेडल था- उन्होंने रियो ओलंपिक 2016 में सिल्वर मेडल जीता था.
सिंधु ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में गोल्ड मेडल जीता था. इससे पहले सिंधु ने बैडमिंटन वर्ल्ड फ़ेडरेशन (बीडब्ल्यूएफ़) वर्ल्ड टूर फ़ाइनल्स 2021 में सिल्वर मेडल जीता था.
सिंधु ने 2019 में वर्ल्ड चैंपियनशिप गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय बनने का ऐतिहासिक कारनामा किया था. वे सितंबर 2012 को 17 साल की उम्र में ही बीडब्ल्यूएफ़ वर्ल्ड रैंकिंग के टॉप-20 खिलाड़ियों में पहुँच गई थीं.
2019 में उन्होंने सर्वाधिक वोट हासिल कर पहला बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड जीता था.
निख़त ज़रीन
2011 में जूनियर वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीत चुकी निख़त ज़रीन महिलाओं की वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप 2022 में गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं.
निख़त ने बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 के फ़्लाइवेट वर्ग मुक्केबाज़ी में भी गोल्ड मेडल जीता.
उन्होंने 2022 का अंत भारत में नेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल करने के साथ किया. ज़रीन को उनके पिता ने इस खेल में डाला क्योंकि वे अपनी ऊर्जावान बेटी की ताक़त को दिशा देना चाहते थे.
12 साल की उम्र में बॉक्सिंग के कारण आंखों के चारों ओर हुए काले धब्बों पर रिश्तेदारों के व्यंग्य से उनकी मां चिंतित नहीं हुईं.
निख़त के पिता ने उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया. तब से निख़त ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
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