बुधवार, 29 अक्तूबर, 2008 को 23:25 GMT तक के समाचार
वर्ल्ड वाइल्ड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़) यानी विश्व वन्य प्राणी कोष ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि अगर दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों को मौजूदा रफ़्तार से ही इस्तेमाल करने का चलन जारी रहा तो अगले तीस साल में इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए दोगुना अधिक संसाधनों की ज़रूरत होगी.
'द लिविंग प्लैनेट' नामक ताज़ा रिपोर्ट में पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि प्राकृतिक संसाधनों का यह संकट मौजूदा वित्तीय संकट से कहीं ज़्यादा गंभीर होगा.
रिपोर्ट के मुताबिक़ हालाँकि अभी दुनिया का पूरा ध्यान आर्थिक उथल पुथल पर लगा है मगर उससे भी बड़ी एक बुनियादी मुश्किल हमारे सामने आ रही है और वो है प्राकृतिक संसाधनों की भारी क़मी की.
इस अध्ययन का तर्क है कि शेयर बाज़ार में हुए 20 खरब डॉलर के नुक़सान की तुलना अगर आप हर साल हो रहे 45 खरब डॉलर मूल्य के प्राकृतिक संसाधनों के नुक़सान से करें तो ये आर्थिक संकट का आँकड़ा बौना साबित होता है.
रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया की तीन चौथाई आबादी पानी, हवा और मिट्टी का बेतहाशा इस्तेमाल कर रही है.
इसके अलावा जंगल जितनी तेज़ी से बढ़ नहीं रहे हैं उससे ज़्यादा तेज़ी से काटे जा रहे हैं, समुद्र में जितनी तेज़ी से मछलियाँ बढ़ नहीं रही हैं उससे ज़्यादा तेज़ी से मारी जा रही है.
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ के प्रवक्ता कॉलिन बटफ़ील्ड का कहना है कि आम लोग बदलाव के अभियान में भाग लेकर एक बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं.
चीन-अमरीका ज़िम्मेदार
बटरफ़ील्ड ने कहा, “आर्थिक संकट के मामले में हमने देखा है कि अगर नेता चाहें तो वैश्विक स्तर पर वे मिलजुलकर काम कर सकते हैं और जल्दी कर सकते हैं, व्यापक संसाधन जुटा सकते हैं. हम चाहते हैं कि इसका इस्तेमाल दरअसल वित्तीय संकट से भी बड़े और दीर्घकालिक संकट से निबटने में किया जाए.”
अमरीका और चीन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने वाले सबसे बड़े देश हैं जबकि अफ़ग़ानिस्तान और मलावी जैसे देश इस सूची में सबसे नीचे आते हैं.
इस बीच चीन ने पहली बार ये माना है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में अब वो अमरीका के बराबर आ गया है.
मगर साथ ही चीन ये भी दोहराना नहीं भूला कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के हिसाब से अगर देखेंगे तो वो अमरीका से कहीं पीछे है.
उधर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ संगठन के प्रमुख एमेका अन्योकू ने कहा कि चादर से लंबे पैर फैलाने के नतीजे हम पिछले कुछ महीनों की घटनाओं
में देख चुके हैं और वित्तीय संकट से हुआ नुक़सान प्राकृतिक संसाधनों को हो रहे नुक़सान के आगे कुछ नहीं रह जाएगा.