सोमवार, 27 अक्तूबर, 2008 को 15:50 GMT तक के समाचार
एक शोध के मुताबिक आत्महत्या करने वाले लोगों और किसी अन्य वजह से मरने वाले लोगों के दिमाग़ में रासायनिक रुप से फ़र्क़ होता है.
कनाडा के विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों ने 20 ऐसे लोगों के दिमाग़ की कोशिकाओं का अध्ययन किया जिनकी मौत हो चुकी थी. उन्होंने पाया कि जिन लोगों ने आत्महत्या की थी उनके दिमाग़ में उस प्रकिया की दर ज़्यादा थी जो लोगों के व्यवहार को प्रभावित करता है.
शोधार्थियों ने 'बायोलॉजिकल साइकोलॉजी' में लिखा है कि संभव है कि इन बदलावों के पीछे पर्यावरण के कारकों का भी कुछ प्रभाव होता है.
शोधार्थियों ने 10 उन लोगों के दिमाग़ों की कोशिकाओं का अध्ययन किया जो गहरे अवसाद से पीड़ित थे और बाद में जिन्होंने आत्महत्या कर ली थी, और 10 ऐसे लोगों के दिमाग़ों की कोशिकाओं का अध्ययन किया जिनकी मौत किन्हीं अन्य वजहों, मसलन हृदय गति के रुक जाने से हुई थी.
शोध में यह बात सामने आई है कि आत्महत्या करने वालों में उस प्रकिया के ज़रिए डीएनए में रसायनिक बदलाव देखा गया जो आम तौर पर कोशिकाओं के विकास को नियंत्रित करता है.
बदलाव की इस प्रकिया को मिथाइलेशन कहा जाता है जो एक कोशिका में अनचाहे जीन को रोक देता है ताकि ज़रुरी जीनों को त्वजा की कोशिकाओं में बदला जा सके न कि, जैसे हृदय कोशिकाओं में.
विश्लेषण के नए रास्ते
मिथाइलेशन की दर आत्महत्या करने वाले लोगों की दिमाग़ों में, उन लोगों की तुलना में जो अन्य कारणों से मरते हैं, क़रीब 10 गुणा ज़्यादा होता है. जिस जीन को रोक दिया जाता है वह एक 'केमिकल मैसेज रिसेप्टर' होता है जो हमारे व्यवहारों को नियंत्रित करता है.
इस शोध से जुड़े माइकल पॉउलटर ने कहा, "यह बात कि दिमाग़ के जिनोम में इतना बदलाव हो सकता आश्चर्यजनक है. क्योंकि दिमाग़ की कोशिकाओं का विभाजन नहीं होता."
उन्होंने बताया कि इस अध्ययन से अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्तियों के विश्लेषण के नए रास्ते खुलेंगे साथ ही इन रोगों का संभावित इलाज भी संभव हो सकेगा.
पिछले शोध में यह बात सामने आई थी कि मिथाइलेशन की प्रक्रिया में जीन और पर्यावरण के कारकों के प्रभाव से बदलाव हो सकता है.