शनिवार, 13 सितंबर, 2008 को 07:27 GMT तक के समाचार
सिद्धार्थ प्रसाद
योग प्रशिक्षक, दिल्ली से
जानू र्शीष आसन और पश्चिमोत्तान आसन के अभ्यास से मन शांत होता है और समर्पण का भाव हमारे व्यक्तित्व में आता है. इन आसनों के अभ्यास से हाथों और पैरों की पेशियाँ ढीली होती हैं. उनकी शक्ति बढ़ती है. पीठ की माँसपेशियाँ भी मज़बूत होती हैं.
जो लोग पैरों को मोड़कर बैठेने वाला आसन नहीं कर पाते हैं. वे लोग इन आसनों के अभ्यास से अपने पैरों की पेशियों की लचक बढ़ा सकते हैं. इस प्रकार जानू शीर्ष आसन और पश्चिमोत्तानासन ध्यानात्मक आसन जैसे पद्मासन, स्वास्तिकासन में बैठने के लिए हमें तैयार करता है.
कैसे करें जानू र्शीष आसन
ज़मीन पर दोहरा कंबल बिछाकर बैठ जाएँ. दोनों पैरों को मिलाकर सामने की ओर रखें. बाएं पैर को घुटने से मोड़ें और बाएँ पैर की एड़ी को जंगा मूल से लगाकर रखें. पैर के तलवे को दाएं पैर के जंघा से सटाकर रखें. दायाँ पैर सीधा रहेगा. दोनो हथेलियों को दाएं पैर के घुटने पर रखें. यह इस आसन की शुरुआती अवस्था है.
पहले सांस भरें और उसे छोड़ते हुए आगे की ओर झुकें. दोनों हाथों को भी आगे की ओर सरकाते जाएँ. पहले सामने देखते हुए शरीर को आगे की ओर झुकाएँ. इस तरह पहले आपका पेट जंघा को छूएगा फिर छाती और कंधों में आगे की ओर खिंचाव आएगा.
अंत में बाएं हाथ की पहली दो अंगुलियों और अंगुठे से दाएं पैर का अँगूठा पकड़ें और दाएं हथेली से दाएं पैरे का तलवा पकड़ने का प्रयास करें. इसके बाद बची हुई सांस भी बाहर निकाल दें.
इस बात का ख़्याल रखें कि दाएं घुटने को मोड़ना नहीं है. थोड़ा खिंचाव आएगा उसे महसूस करें. इसके बाद सांस भरते हुए वापस आ जाएँ और दोनों हथेलियों को भी दाएँ घुटने पर ले आएँ. इस तरह पैरों की स्थिति बदलें और फिर से दोहराएँ. यह आसन दोनों पैरों से 2-2 बार करें.
ध्यान रखें...
जिन लोगों को स्लिप डिस्क और श्याटिका की समस्या हो वैसे लोग यह आसन न करें.
फ़ायदे..
पैरों की मांसपेशियाँ ढीली होती हैं. कमर और कूल्हे का तनाव भी कम होता है. पीठ की मांसपेशियाँ ढीली, तनाव रहित और मज़बूत होती हैं. इस प्रकार के आगे झुकने वाले आसन के अभ्यास से समर्पण का भाव आता है.
जानू शीर्ष आसन पश्चिमोत्तान आसन की शुरुआती अवस्था है. इसके अभ्यास से पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास आसान हो जाता है.
पश्चिमोत्तान आसन
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| जानूशीर्षासन के बाद इस आसन का अभ्यास करना चाहिए |
इसका अभ्यास जानू शीर्ष आसन के अभ्यास के बाद ही करना चाहिए. ज़मीन पर दोहरा कंबल बिछाकर बैठें. दोनों पैरों को सामने की ओर मिलाकर रखें और दोनो हाथ पैरों को घुटनों पर रखें. शरीर सीधा रखिए. यह प्रारंभिक स्थिति है.
साँस भरें और साँस छोड़ते हुए आगे झुकिए, साथ ही साथ हथेलियों को भी आगे सरकाते जाएँ और अंत में पैरों के अँगूठे को हाथों को पहली दो अँगुली से पकड़े. अगर यह संभव न हो तो टख़नों को पकड़ लिजिए. अब बाज़ू को अपनी ओर खींचिए, बची हुई साँस को भी बाहर निकालते हुए अपने माथे को घुटनों से लगाने का प्रयास करेंगे.
पीठ की माँसपेशियों पर बल नहीं लगाएँगे और घुटने भी नहीं मोड़ेंगे. तत्पश्चात साँस भरते हुए बाजू सीधा करें, सामने देखिए और शरीर को ऊपर लाते हुए वापस प्रारंभिक स्थिति में आ जाएँ और दोनो हाथों को फिर से घुटनों पर ले आएँ.
अवधि------- 5 बार दोहराएँ
सावधानी—कमर दर्द और स्लिप डिस्क वाले ये आसन नहीं करेंगे.
लाभ - पैरों की, ख़ासकर पिण्डली और जंघा की पेशियों में खिँचाव आता है. हैमस्ट्रिंग वाली माँसपेशियों का तनाव भी कम होता है.
पेट के सभी अंगों को स्फ़ूर्ति प्रदान करता है जैसे लीवर (lever), अग्नाश्य (pancrease), तिल्ली(spleen) और गुर्दे (kidney) आदि की क्षमता नियमित करता है.
जिन्हे मधुमेह है वे भी पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास कर सकते हैं. क्योंकि अग्नाश्य पर दबाव पड़ने से उसकी कार्यक्षमता बढ़ती है.
महिलाएँ जिन्हे मासिक धर्म की समस्याएँ हो, उन्हे योगासन के अभ्यास के साथ ही साथ पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास भी करना चाहिए.
आगे झुकने से रीढ़ की सभी कशेरूकाएँ (vertebrae) ढीले होते हैं उनके बीच का तनाव कम होता है. फलस्वरूप रीढ़ के पास की रक्त नलिकाओं में संचार बढ़ जाता है और शरीर के सभी अंगो में भी रक्त की आपूर्ति सरलता से होती है.
विशेष- पैरों की पेशियाँ ढीली होने से पद्मासन, सवस्तिकासन आदि ध्यानात्मक आसन सरलता ने होने लगते हैं.