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मोबाइल ने खोला मानव आदतों का राज़

एक अध्ययन के तहत मानव गतिविधियों की एक व्यापक रूपरेखा जानने के लिए लाखों मोबाइल फ़ोन धारकों पर निगाह रखी गई और इस अध्ययन का निष्कर्ष निकला है कि मानव अपनी आदतों से बंधा हुआ है.

शोध के मुताबिक आम तौर पर लोग बंधे-बंधाए दायरे में ही घूमते हैं और उन्हीं जगहों पर बार-बार जाते हैं.

नेचर पत्रिका में छपे इस शोध के अनुसार इनमें से ज़्यादातर लोग 10 कीलोमीटर के दायरे में ही घूमते हैं.

इस अध्ययन के परिणामों को किसी बीमारी को फैलने से बचाने या यातायात भविष्यवाणी के लिए भी प्रयोग किया जा सकता था.

इससे पहले शोधार्थियों ने मानव गतिविधियों का अध्ययन जीपीएस व्यवस्था या सर्वेक्षण से करने की कोशिश की लेकिन यह काफ़ी महंगा था.

इसके बाद एक वेबसाइट के माध्यम से मानव गतिविधियों का ब्यौरा लिया गया. लेकिन इसे भी मानव व्यवहार का उचित मापदंड नहीं माना गया.

निजता की गारंटी

फिर नए तरीके में यूरोप में साठ लाख मोबाइल फ़ोन धारकों के सैंपल में से एक लाख लोगों की आवाजाही पर नज़र रखी गई.

इसमें जब भी इन लोगों ने फ़ोन पर बात की या एसएमएस किया या पाया, मोबाइल के स्थान की जानकारी आधार स्टेशन को मिल गई और यह डाटा रिकॉर्ड कर लिया गया.

शोधार्थियों का कहना है कि उन्हें इस जानकारी को देने की आज़ादी नहीं है कि यह आँकड़े कहां एकत्र किए गए. उन्होंने कहा कि इनमें शामिल सभी लोगों की निजता की गारंटी के लिए कदम उठाए जा रहे हैं.

यह जानकारी छह महीनों तक एकत्र की गई.

टीम के एक सदस्य प्रोफ़ेसर अलबर्ट लाज़्लो बाराबासी ने कहा, "अधिकतर लोग पाँच से दस किलोमीटर तक की दूरी में ही चलते-फिरते हैं. जबकि चंद लोग ऐसे भी हैं जो नियमित रूप से कुछ सौ किलोमीटर तक के दायरे में भी जाते हैं."

इन परिणामों से पता चला है कि ज़्यादातर लोगों की गतिविधियाँ एक गणितीय संबंध का अनुसरण करती हैं जिसे पावर लॉ कहते हैं.

मूल नियमावली

प्रोफ़ेसर अलबर्ट लाज़्लो के अनुसार, "दूसरा आश्चर्य यह है कि लंबी और छोटी दूरियों पर लोगों की गतिविधियों का प्रारूप बहुत कुछ मिलता जुलता है क्योंकि लोग अपने उन्हीं पसंदीदा स्थानों पर बार बार पहुँचते हैं जहाँ वे अक्सर जाते हैं."

उन्होंने कहा कि इसके बाद इसका मॉडल बनाने वालों को इसे समझने के लिए एक मूल नियमावली का पता लग गया.

प्रोफ़ेसर ने कहा, "इन लोगों के बीच यह एकरूपता बहुत उत्साहित करने वाली है और इसके व्यावहारिक अनुप्रयोग हैं."

लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल डिज़ीज़ के प्रोफ़ेसर जॉन क्लीलेंड ने कहा कि यह परिणाम संक्रामक बीमारियों के अध्ययन के लिए भी प्रयोग किए जा सकते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "जब भी हवा के संपर्क से कोई संक्रामक बीमारी फैलती है तब हमें लोगों की गतिविधियों की रूपरेखा की ज़रूरत होती है."

इस अध्ययन के एक सदस्य और बोस्टन विश्वविद्यालय के डॉ मार्टा गोंज़ालेज़ ने कहा कि यातायात योजनाकारों ने भी इस अध्ययन में रुचि दिखाई है.

यह अध्ययन अभूतपूर्व है लेकिन यह पहली दफ़ा नहीं है जब मोबाइल फ़ोन तकनीक का प्रयोग लोगों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए किया गया हो.

संभावनाएँ

रोम में यातायात के मॉडल को बनाने के लिए इसका प्रयोग किया गया था जबकि माइक्रोसॉफ़्ट के शोधार्थियों ने कोयले की खानों में काम करने की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए इस तकनीक का प्रयोग किया.

आपराध विज्ञान में भी इसका प्रयोग नया नहीं है. अपराधियों की गतिविधियों और ठिकानों का पता लगाने के लिए काफ़ी समय से इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है.

इस तकनीक के व्यापारिक उपयोग भी हैं. जैसे अभिभावकों को उनके बच्चों के बारे में अलर्ट दिए जाते हैं कि वे कहाँ हैं.

इस शोध के प्रमुख और ऑफ़कॉम में रिसर्च एंड डवलपमेंट प्रमुख डॉ विलियम वैब कहते हैं कि इसके बावजूद मोबाइल फ़ोन के आँकड़ों का प्रयोग बहुत कम हो रहा है.

उन्होंने कहा, "अभी इस क्षेत्र में बहुत काम होना बाकी है क्योंकि व्यापारी और शोधार्थी इसके प्रयोग के नए रास्ते तलाश कर रहे हैं. यह तय है कि अगले कुछ सालों में इस क्षेत्र में अनेक नए विचार सामने आएंगे."