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रविवार, 20 अप्रैल, 2008 को 08:32 GMT तक के समाचार

ये चिड़िया हैं या सैनिक ?

एक नए शोध में ये बात सामने आई है कि सैनिकों की ही तरह चिड़ियों की एक खास प्रजाति में भी सैनिक चिड़िया होती हैं.

ब्रितानिया के ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉक्टर एंडी रैडफ़ोर्ड ने अफ़्रीका के कालाहारी रेगिस्तान में पाई जाने वाली चिड़िया की खास प्रजाति 'पाइड बैबलर' पर ये शोध पेश की है.

इस शोध के मुताबिक युद्ध के दौरान जिस तरह से आम सैनिक अपने कमांडर को सुरक्षा घेरे में लेकर चलते हैं ठीक उसी तरह इन चिड़ियों में एक अपने समूह की बाकी चिड़ियों की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखती हैं.

डॉक्टर रैडफ़ोर्ड का कहना है, "निस्वार्थ भावना से सहयोग करने का ये एक बेहतरीन उदाहरण है. इस तरह से ये चिड़िया अच्छा खासा भोजन जुटा लेती है."

अफ़्रीका के कालाहारी रेगिस्तान में पाई जाने वाली 'पाइड बैबलर' चिड़िया के एक समूह में छह से सात चिड़िया तक होती हैं.

जब कभी ये समूह दाना चुगने के लिए निकलता है उस वक्त एक 'पाइड बैबलर' चिड़िया खास तरह की आवाज़ निकालकर समूह के बाकी साथियों को बताती है कि यहाँ दाना चुगने में कोई ख़तरा नहीं है.

'पाइड बैबलर' को ख़तरा

रेगिस्तानी इलाक़ों में चिड़ियों को दाना चुगने के दौरान आसमान और ज़मीन दोनों तरफ़ से ख़तरा होता है.

ज़मीन पर मंगूस और कोबरा जैसे सांप 'पाइड बैबलर' पर हमला कर सकते हैं. जबकि आसमान से बाज़ इन पर हमला कर सकता है.

'पाइड बैबलर' चिड़िया ठीक उसी तरह अपने समूह की हिफ़ाज़त करती है जैसे रेडियो के ज़रिए लगातार संपर्क में रहकर थलसेना का आम संतरी अपने कमांडर की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखता है.

इस तरह से 'पाइड बैबलर' चिड़ियों का ये समूह अपने लिए अच्छा खासा भोजन इक्ट्ठा कर लेता है.

'पाइड बैबलर' का भोजन

'पाइड बैबलर' खास तौर पर ज़मीन की सतह के नीचे रहने वाले बिच्छुओं और छोटे सांपों का शिकार करती हैं.

इस दक्षिण अफ़्रीकी रेगिस्तान में शोध के दौरान डॉक्टर रैडफ़ोर्ड ने 'पाइड बैबलर' चिड़ियों के 12 से 20 समूहों का काफ़ी नज़दीक से अध्धय्यन किया.

इस शोध के दौरान डॉक्टर रैडफ़ोर्ड ने कुछ 'पाइड बैबलर' चिड़ियों को प्रशिक्षण भी दिया था. जिससे उन्हें इन समूहों के काफ़ी नज़दीक़ जाने का मौक़ा भी मिला.

शोधकर्ताओं ने कुछ ही फ़ुट की दूरी से 'पाइड बैबलर' के व्यवहार का अध्धय्यन किया.

इससे एक बात का और खुलासा हुआ कि 'पाइड बैबलर' चिड़ियों का समूह अपने चौकीदार की आवाज़ पर ही पूरी तरह निर्भर करता है. फिर चाहे वो उसे देख भी पा रहा हो या नहीं.

"इस शोध ये इस बात का भी खुलासा हुआ कि पक्षियों के अलग-अलग आवाज़ निकालने का क्या मतलब होता है. किस तरह से जानवर या पक्षियों ने आवाज़ों या भाषाओं का विकास किया है."