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रविवार, 24 फ़रवरी, 2008 को 06:46 GMT तक के समाचार

पिघलते ग्लेशियर ने चिंता बढ़ाई

ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम यानी जीपीएस सैटेलाइट से मिले प्रमाणों के आधार पर ब्रितानी वैज्ञानिकों नें बताया है कि पश्चिमी अंटार्कटिक ग्लेशियर के पिघलने की दर इस साल सात गुना ज़्यादा हो गई है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि बर्फ़ के पिघलने का क्रम लगातार जारी है और अगर ऐसा ही होता रहा तो इससे समुद्री जल स्तर में भारी इज़ाफ़ा सकता है.

ये नए प्रमाण पश्चिमी अंटार्कटिक के निर्जन टेक्सस क्षेत्र से मिले हैं.

‘ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे’ से जुड़े डॉक्टर डेविड वेवन ने बताया, “इसे पश्चिमी अंटार्कटिका में बर्फ़ की कमज़ोर निचली चादर कहा जा रहा है उसकी वजह ये है कि ये क्षेत्र तलहटी की ओर एकदम एकांत में पड़ता है.”

सैटेलाइट से मिले प्रमाण बताते हैं कि यहां पर कई बड़े ग्लेशियर दशकों से पिघलते जा रहे हैं.

यहां पर सबसे बड़ा बर्फ़ का पहाड़, ‘पाइन आइसलैंड ग्लेशियर’ सबसे अधिक पिघला है.

इन बर्फ़ीले पहाड़ों से हाल ही वापस आए जूलियन स्कॉट ने बीबीसी को बताया, “ये बहुत महत्वपूर्ण ग्लेशियर है; ये अंटार्कटिका के दूसरे पहाड़ों में से सबसे ज़्यादा पिघल रहा है.”

“पाइन आइसलैंड ग्लेशियर दो किलोमीटर मोटा, 30 किलोमीटर चौड़ा है और इसका क़रीब 3.5 किलोमीटर हिस्सा पिघल कर समुद्र में मिल रहा है.”

सर्वे के दौरान वैज्ञानिकों को बहुत मुश्किलों से गुज़रना पड़ा, एक बार तो तापमान शून्य से तीस डिग्री तक नीचे चला गया.

रॉब बिंघम ने बताया , “हवाएं बेहद ठंडी थी उनके बीच काम करना वाकई मुश्किलों भरा रहा.”

रखी जा रही है नज़र

जूलियन स्कॉट ने वहां भूकंप रोधी तंत्रों से भी पहाड़ों की जांच की. उन्होंने बीस मीटर अंदर तक छेद कर उसमें गर्म पानी डाला और हो रहे बदलाव का जायज़ा लिया.

सैटेलाइट से अब तक मिले तथ्यों के मुताबिक़ सिर्फ़ इस साल बर्फ़ सात प्रतिशत अधिक पिघली है.

इसका कारण वातावरण की गर्मी नहीं है. वैज्ञानक इसकी वजह महाद्वीप में ग्लेशियर को समुद्र के गर्म जल से बचाने के लिए समुद्री बर्फ़ का कम होना मान रहे हैं.

इसे काफ़ी संवेदनशील क्षेत्र माना जा रहा है.

डेविड वेवन ने कहा, “अब हमारे पास आंकड़े हैं जो ये बताते हैं कि इस क्षेत्र में कितना बदलाव आ रहा है और ये चिंताजनक भी है.”

वैज्ञानिक एक अच्छी बात ये मान रहे हैं कि वहां पर जीपीएस यंत्र लगा दिए गए हैं क्योंकि इससे उन्हें आगे होने वाले परिवर्तनों की सूचना मिलती रहेगी.

अगर ग्लेशियर ऐसे ही पिघलते रहे तो इसकी ज़्यादातर बर्फ़ समुद्र में ही मिलेगी. शोध बताते हैं कि अकेले पाइन आइसलैंड ग्लेशियर से ही वैश्विक समुद्री जल स्तर 25 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है.

हलांकि ऐसा होने में कई दशक या सदी लग सकती है इस पूरे क्षेत्र में बर्फ़ीले पहड़ों के पिघलने से समुद्री जलस्तर के 1.5 मीटर तक बढ़ सकने की बात कही जा रही है.