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शुक्रवार, 07 सितंबर, 2007 को 12:34 GMT तक के समाचार

मुकेश शर्मा
बीबीसी हिंदी संवाददाता

जड़ी बूटियों के गुणों वाले भारतीय बुर्क़े

त्वचा से जुड़ी कोई परेशानी हो तो क्रीम-लोशन या कोई और घरेलू उपाय तो लोग करते ही हैं पर अगर इसे दूर करने का उपाय आपके कपड़ों में या जिस बिस्तर पर आप सो रहे हैं, उसके चादरों में ही हो जाए तो क्या कहना.

भविष्य में ऐसा संभव हो सकता है, अगर आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल के साथ बन रहे कपड़ों का प्रचलन कुछ और बढ़ जाए तो.

भारत में आयुर्वस्त्र नाम से न सिर्फ़ ऐसे कपड़े बन रहे हैं बल्कि ऐसे कपड़ों से बने बुर्क़े सऊदी अरब में निर्यात तक हो रहे हैं.

इसे तैयार करने वालों के अनुसार आयुर्वेद से जड़ी बूटियों की जानकारियाँ ली गई हैं इसलिए वहाँ से ‘आयुर्’ लेकर और उसे वस्त्र नाम से जोड़कर इन कपड़ों का नाम रखा गया है, आयुर्वस्त्र.

केरल राज्य के बलरामपुरम् इलाक़े में कुछ बुनकरों ने हैंडलूम वीवर्स डेवलपमेंट सोसाइटी नाम से एक संस्था बनाई और इस तरह के कपड़े तैयार किए.

'दो तरीक़े'

इस संस्था से जुड़े हुए और लंदन में स्थित राष्ट्रकुल सचिवालय में पर्यावरण नीति विश्लेषक रह चुके डॉक्टर के रवि ने हमें बताया कि ये कपड़ा दो तरीक़ों से तैयार होता है.

डॉक्टर रवि के अनुसार, “पहले तरीक़े में धागा बनाते समय ही उसमें जड़ी बूटियाँ डाली जाती है. इसके तहत पहले, धागे को गौमूत्र में दो दिन रखते हैं और फिर उसे जड़ी-बूटियों के रसों के साथ एक हफ़्ते रखा जाता है. इसके बाद उस धागे से कपड़ा तैयार होता है.”

वह कहते हैं कि दूसरे तरीक़े में पहले कपड़ा तैयार होता है और फिर उसे जड़ी बूटियों के रस के साथ रंगा जाए.
दिल्ली में पेंचेंट इंडिया नाम की कंपनी के निदेशक और इस तरह के कपड़ों के व्यापार से जुड़े चैतन्य अरोड़ा का कहना है कि इसमें कई तरह की जड़ी बूटियों का इस्तेमाल हो रहा है.

चैतन्य अरोड़ा के अनुसार, “हर जड़ी बूटी का चिकित्सकीय गुण होता है. जैसे चंदन त्वचा रोग में काम आता है. मंजीठा त्वचा और तपेदिक के लिए अच्छा होता है. इसी तरह तुलसी कई बीमारियों से लड़ने में मदद करती है. कुल मिलाकर 50-60 जड़ी बूटियों का इस्तेमाल इसमें हो रहा है.”

जामुन या अनार से काला रंग, हल्दी से पीला रंग, मंजीठे से लाल रंग या नमक, पानी, घास और धूप की रोशनी के साथ सफ़ेद रंग लेकर कपड़े तैयार हो रहे हैं.

'उत्साहजनक नतीजे'

बीमारियों से जुड़े दावों के बारे में त्रिवेंद्रम में राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के सेवानिवृत्त डीन डॉक्टर विश्वनाथन् का कहना है कि शुरुआती तौर पर उन्हें कुछ उत्साहजनक लक्षण दिखे और इसीलिए अब इस बारे में विस्तृत शोध हो रहा है.

डॉक्टर विश्वनाथन् के अनुसार केंद्रीय योजना आयोग ने और शोध के लिए कुछ धन दिया जो राज्य सरकार के ज़रिए उन्हें मिला है और जो शोध हुए हैं उससे मिले आँकड़ों का अध्ययन हो रहा है.

वह कहते हैं, “हमने त्वचा से जुड़े रोगों पर इसके असर का अध्ययन किया है. कुछ लोगों को हमने आयुर्वस्त्र के साथ त्वचा रोग की दवाएँ दीं जबकि कुछ को सिर्फ़ दवाएँ ही दी गईं. अब हम दोनों तरह के लोगों के अध्ययन से मिले आँकड़ों का आकलन कर रहे हैं. ये अध्ययन 15 दिन में पूरा हो जाने की उम्मीद है और फिर हम अपना निष्कर्ष राज्य सरकार को सौंप देंगे.”

आयुर्वस्त्र नाम से बन रहे ये कपड़े लोकप्रियता में भारत की सीमा भी लाँघ रहे हैं और अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया के साथ साथ मध्य पूर्व के देशों में भी इनकी पहुँच हो रही है.

तरह-तरह के कपड़े

केरल में हैंडलूम वीवर्स डेवलपमेंट सोसाइटी से जुड़े लोगों का कहना है कि आयुर्वस्त्र में चादरें, शर्ट, साड़ी, चूड़ीदार कपड़े तो बन ही रहे हैं इससे बने बुर्क़े मध्य पूर्व के देशों में काफ़ी लोकप्रिय हो रहे हैं.

उनका दावा है कि गर्मी के दिनों में ये बुर्क़े पहनने से ठंड का एहसास होता है और ठंड के दिनों में गर्मी का.

वैसे बाहर के देशों में भले ही धीरे-धीरे इनकी लोकप्रियता बढ़ रही हो मगर भारत में अभी आयुर्वस्त्र उतना लोकप्रिय नहीं हुआ है.

उसकी वजह बताते हुए चैतन्य अरोड़ा कहते हैं, “एक तो आयुर्वस्त्र साधारण कपड़ों से कुछ महँगे होते हैं. दूसरा इस तरह के कपड़ों को भारत में बढ़ाने के लिए अच्छे निवेशक नहीं मिल रहे हैं. जड़ी बूटियाँ लाने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि आम तौर पर वे मौसम से जुड़ी होती हैं.”

उनका कहना है कि अगर ठीक ढंग से इस दिशा में काम हो और निवेश हो तो भारत का ये उत्पाद अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाज़ार में धूम मचा सकता है.

आयुर्वस्त्र का काम मुख्य रूप से केरल में हो रहा है और अगर ये आयुर्वस्त्र सफल हो जाता है तो ये वहाँ के बुनकरों के लिए तो अच्छी ख़बर होगी ही साथ ही पहाड़ियों के उन जनजातीय लोगों के लिए भी ये आयुर्वस्त्र ख़ुशख़बरी लाएगा जो आयुर्वेदिक महत्त्व के पौधे उगाकर ही जीविका कमाने की कोशिश करते हैं.