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शुक्रवार, 13 जुलाई, 2007 को 10:53 GMT तक के समाचार

बुढ़ापे की कहानी, 'तिल' की ज़ुबानी

शायद ही कभी किसी ने सोचा होगा कि हमारे शरीर पर मौजूद तिलों की संख्या और बढ़ती उम्र में कोई संबंध हो सकता है.

लंदन के किंग्स कॉलेज के वैज्ञानिकों के हाल में किए एक अध्ययन से संकेत मिले हैं कि जिस आदमी के शरीर पर जितने अधिक तिल होते हैं उसमें जल्द बुढ़ापा आने की संभावना उतनी ही कम हो सकती है.

वैज्ञानिकों ने 1800 जुड़वा लोगों के तिलों और बुढ़ापे के डीएनए का तुलनात्मक अध्ययन किया.

ये अध्ययन 'कैंसर एपिडेमियोलॉजी बायोमार्कर्स एंड प्रिवेंशन' पत्रिका में छपा है.

वैसे शरीर पर अधिक तिल होने से 'मेलानोमा' नाम के त्वचा के कैंसर होने की संभावना भी थोड़ी बढ़ जाती है.

तिल बचपन में होते हैं और अधेड़ उम्र तक गायब होने लगते हैं.

डीएनए

अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने कोशिकाओं में 'टेलोमियर' की लंबाई और शरी पर तिलों की संख्या के बीच के अंतर्संबंध के बारे में पता लगाने की कोशिश की.

'टेलोमियर' डीएनए के बंडल होते हैं और हर कोशिका के क्रोमोज़ोम के अंत में पाए जाते हैं और क्रोमोज़ोम के सिरों को स्थिर रखते हैं और उनकी रक्षा भी करते हैं.

टेलोमियर शरीर के दिल, हड्डी, मांसपेशी और धमनी जैसे अंगों के बूढ़े होने के अच्छे सूचक होते हैं.

दरअसल, शरीर के बूढ़े होने के साथ-साथ टेलोमियर छोटे होने लगते हैं.

हम इनकी तुलना जूते के फ़ीतों के अगले हिस्से पर लगे प्लास्टिकों से कर सकते हैं.

शोध

अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन-जिन लोगों के शरीर पर 100 से अधिक तिल थे उनके टेलोमियर अधिक लंबे थे जबकि जिनके शरीर पर 25 से कम टेलोमियर थे, उनके टेलोमियर छोटे थे.

1800 जुड़वा लोगों को दो समूहों में बाँटा गया और पाया गया दोनों समूह के लोगों में छह से सात साल की उम्र का अंतर देखने को मिला.

शीर्ष शोधकर्ता वेरोनिक बैतेई ने कहा,"इस अध्ययन के परिणाम बहुत उत्तेजक हैं. जहाँ एक तरफ ज़्यादा तिल होने वाले लोगों में त्वचा का कैंसर होने की संभावना थोड़ी बढ़ जाती है वहीं उनमें बूढ़े होने की दर कम हो जाती है."