बुधवार, 11 जुलाई, 2007 को 10:09 GMT तक के समाचार
माँस, ब्रेड, दूध और पुडिंग्स से बने पश्चिमी भोजन खाने से एशियाई मूल की महिलाओं में स्तन कैंसर का ख़तरा बढ़ सकता है.
चीन के फ़ॉक्स चेज़ कैंसर सेंटर के शोधकर्ताओं ने 1500 महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में पाया कि जिन औरतें ने मांसाहार किया उनमें शाकाहारी खाना खाने वाली औरतों की अपेक्षा बीमारी होने का जोखिम अधिक था.
वैसे अध्ययन में ये भी पता चला कि सिर्फ अधिक वजन वाली और रजोनिवृत्त औरतों में पश्चिमी आहार से स्तन कैंसर होने का ख़तरा दोगुना था.
वैसे एशियाई मूल की महिलाओं को पश्चिमी देशों की तुलना में स्तन कैंसर का ख़तरा कम होता है लेकिन अब इनमें भी ख़तरनाक ढंग से बढ़ोत्तरी देखी जा रही है.
मोटापा भी इन बीमारियों को बुलावा देने में अहम भूमिका निभाता है.
जिन महिलाओं का शरीर भार सूचकांक यानी बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) 25 से ज्यादा होता है उनमें बीमारी का ख़तरा अधिक होता है.
फ़ॉक्स चेज़ कैंसर सेंटर के शोधकर्ताओं के मुताबिक रजोनिवृत महिलाएँ पश्चिमी खानपान में कटौती और नियमित व्यायाम से स्तन कैंसर के ख़तरे को कम कर सकती हैं.
मांसाहार के ख़तरे
चीन के एंटी-कैंसर एसोसिएशन के आंकड़ो के मुताबिक 1990 के दशक में चीन के बड़े शहरों में स्तन कैंसर से होने वाली मौतों की तादात 38.9 फ़ीसदी बढ़ी जबकि इस तरह के मामलों में 37 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई.
इसकी ख़ास वजह खानपान की आदतों में बदलाव हो सकता है.
पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों का कहना है कि स्तन कैंसर के दस फ़ीसदी मामलों की वजह मोटापा होता है.
'ब्रेकथ्रू ब्रेस्ट कैंसर' नाम से चल रहे कैंसर कार्यक्रम की डॉक्टर सारा कैंट ने कहा, "खानपान और स्तन कैंसर के बीच आपसी संबंध ढूंढना बहुत कठिन है. इस अध्ययन में कुछ मुद्दों जैसे ज़्यादा उम्र में माँ बनना, व्यायाम न करना और दवाओं के सेवन की चर्चा नहीं की गई है."
सारा कैंट ने कहा कि स्तन कैंसर का ख़तरा बढ़ाने में आहार का असर पता लगाना एक जटिल काम है.