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शनिवार, 07 अप्रैल, 2007 को 13:47 GMT तक के समाचार

जलवायु परिवर्तन का असर करोड़ों पर

जलवायु परिवर्तन पर जारी एक अहम रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे करोड़ों लोगों को पानी नहीं मिलेगा, फसलें चौपट हो जाएँगीं और बीमारियाँ फैलेंगी.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि छह साल पहले वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि जलवायु परिवर्तन के पीछे मानवीय गतिविधियाँ हो सकती हैं लेकिन अब इसमें कोई शक नहीं रहा.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के परिणाम दिखने लगे हैं और यह पूरी दुनिया में दिखाई दे रहे हैं किसी एक क्षेत्र विशेष में नहीं.

वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का कहना है कि जिन लोगों ने वैश्विक तापमान बढ़ाने में सबसे कम योगदान दिया है वे सबसे अधिक पीड़ित हैं.

लंबे इंतज़ार के बाद शुक्रवार, छह अप्रैल को इंटरगवर्नमेंट पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट पर लंबी बहस हुई, वाद-विवाद हुए, वॉकआउट हुए और विरोध जताया गया और आख़िरकार दोपहर को ब्रुसेल्स में प्रकाशित किया गया.

इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले प्रमुख लोगों में से एक सलीम उल-हक़ का कहना था, "एक तथ्य को कोई नहीं नकार सकता, वह यह है कि जलवायु परिवर्तन का असर दिखाई दे रहा है और पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है."

धुँधला भविष्य

रिपोर्ट में एक धुँधले या डरावने भविष्य की तस्वीर दिखाई गई है.

इसके अनुसार भविष्य में पानी की किल्लत होगी लेकिन बाढ़ एक सामान्य समस्या होगी, बीमारियाँ तेज़ी से बढ़ेंगी लेकिन फसलों में लगातार कमी आएगी.

इसके अनुसार लाखों लोग भूखे रहेंगे और लाखों लोग मारे जाएँगे.

रिपोर्ट के अनुसार यह सब दुनिया में जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग का असर होगा.

इसमें कहा गया है कि दोनों ध्रुव, अफ़्रीका, एशिया और प्रशांत महासागर के छोटे द्वीप इसके निशाने पर होंगे.

लेकिन ग़रीब लोग, चाहे वो दुनिया के किसी भी हिस्से में रहते हों, वे अमीरों की तुलना में जलवायु परिवर्तन के परिणामों को ज़्यादा भोगेंगे.

रिपोर्ट में कहा गया है कि विकसित देशों को चाहिए कि वह विकासशील देशों को गोद ले ले.

लेकिन कई लोग मानते हैं कि गोद ले लेना या निगरानी में ले लेना ही कोई रास्ता नहीं है.

रिपोर्ट में अफ़्रीकी देशों पर प्रभाव के लेखक एंटोनियो यंग का कहना है, "ज़रुरी यह है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए दोषी देश इसमें कमी लाएँ."

आईपीसीसी के को-चेयरमैन मार्टिन पैरी ने कहा है, "अब वैज्ञानिकों को मॉडलों के साथ जूझना नहीं पड़ेगा क्योंकि अब असर साफ़ दिख रहा है जिसे मापा जा सकता है और सरकारो को समझाया जा सकता है कि तत्काल कार्रवाई की ज़रुरत है."