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शनिवार, 03 फ़रवरी, 2007 को 02:03 GMT तक के समाचार

बाध्यकारी प्रावधान स्वीकार नहीं:अमरीका

अमरीका ने नई पर्यावरण रिपोर्ट का स्वागत तो किया है लेकिन हानिकारक गैसों का उत्सर्जन नियंत्रित करने के बाध्यकारी प्रावधानों का विरोध किया है.

पर्यावरण संबंधी रिपोर्ट में तत्काल क़दम उठाए जाने की बात कही गई है.

दूसरी ओर अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण संबंधी रिपोर्ट का स्वागत किया है लेकिन साथ ही पर्यावरणघाती गैसों के उत्सर्जन के नियंत्रण की बाध्यता का विरोध किया है.

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि पर नज़र रखने वाले अंतरराष्ट्रीय पैनल आईपीसीसी का कहना है कि जलवायु में जो भी परिवर्तन हो रहा है उसके पीछे ज़्यादा हाथ मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले हालात का ही है.

इस पैनल ने शुक्रवार को अपनी यह रिपोर्ट पेरिस में जारी की जिसमें अनुमान व्यक्त किया गया है कि इस शताब्दी के अंत तक दुनिया का तापमान 1.8 से 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा.

इस रिपोर्ट को दो हज़ार से अधिक वैज्ञानिकों ने तैयार किया है जिसे अनेक सरकारों का समर्थन हासिल है.

दरअसल धरती के बढ़ते तापमान पर चर्चा और संकल्पों की कहानी पुरानी है.

सन् 1992 से ही पश्चिमी देशों को यह पता था कि बढ़ते तापमान को रोकने की दिशा में उन्हें कुछ करना होगा. लेकिन वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे.

अंतरराष्ट्रीय पैनल आईपीसीसी के अध्यक्ष की रिपोर्ट में भी यही संकेत दिया है.

क्योतो संधि की शर्तों पर यदि अमल किया जाता तो स्थिति इतनी भयावह नहीं होती.

पश्चिमी देशों की सफ़ाई

लेकिन अब इस रिपोर्ट के बाद पश्चिमी देशों ने सफ़ाई देनी शुरू कर दी है.

ब्रिटेन के पर्यावरण मंत्री इयन पियरसन ने कहा कि पश्चिमी देशों के कानों तक इस रिपोर्ट की गूंज पहुँच रही है.

उनका कहना था,'' हम यह मानते हैं कि चीन, भारत और ब्राज़ील की जनता विकसित देशों से अपेक्षा करती है कि बढ़ते तापमान को रोकने में वे कुछ और क़दम उठाए. और हमें अब यह करना ही होगा.''

यानी इसके लिए कुछ नई नीतियाँ अपनानी होंगी जिससे घातक गैसों के रिसाव पर लगाम लगाई जा सके.

फ़्रांस के राष्ट्रपति ज़्याक़ शिराक ने कहा,'' इस आपात स्थिति से जूझने के लिए अधपकी नीतियों से काम नहीं चलेगा. एक वास्तविक आंदोलन का वक्त आ गया है. और यह आर्थिक नीतियों और राजनीतिक गतिविधियों से संभव होगा.''

इन शब्दों को सुनकर ऐसा लगता है कि पश्चिम के औद्योगिक देशों को कुछ झटका तो लगा ही है.

पिछड़े डेढ़ दशकों से वे पर्यावरण परिवर्तन की समस्या से मुँह मोड़ते से रहे हैं.

यही कारण है कि भारत जैसे विकासशील देश अपने विकास की दलील देते हैं.

भारतीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम का कहना है,'' जब विकसित देश विकास के रास्ते पर चले थे, तब उनसे किसी ने नहीं पूछा कि आप इतनी ऊर्जा की खपत क्यों करते हैं और आज भी उनसे कोई खपत कम करने के लिए नहीं कह रहा है.''

आईपीसीसी के चेयरमैन डॉक्टर राजेंद्र पचौरी का कहना था, " यह बहुत उत्साहजनक बात है कि अब से पहले की रिपोर्टों में जो कुछ कहा गया है, ताज़ा रिपोर्ट में उससे कहीं बेहतर आकलन पेश किया जा सका है."

पैनल का कहना है कि जलवायु परिवर्तन पर मानवीय गतिविधियों का प्रभाव स्पष्ट करने के लिए अब पहले के मुक़ाबले ज़्यादा सख़्त भाषा का इस्तेमाल किया जाएगा.

इस रिपोर्ट को जलवायु परिवर्तन पर एक सटीक आकलन क़रार दिया जा रहा है.