शनिवार, 18 नवंबर, 2006 को 00:11 GMT तक के समाचार
जलवायु परिवर्तन को लेकर हो रहा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ग्रीन हाउस गैसों का रिसाव रोकने के लिए कोई टाइम टेबल तय किया बिना ख़त्म हो गया है.
वैसे केन्या की राजधानी नैरोबी में हो रहे इस सम्मेलन में दुनिया भर के देशों ने क्योतो संधि के वायदों को पूरा करने के लिए सहमति जताई है.
लेकिन पर्यावरणवादियों की चिंता यह है कि क्योतो संधि 2012 में समाप्त हो जाएगी और एक साल और बीत गया जब उसके बाद पर्यावरण के लिए घातक ग्रीनहाउस गैस का रिसाव कम करने के लिए लक्ष्य निर्धारित नहीं किए जा सके.
वर्ल्ड वाइल्ड फ़ोरम (डब्लूडब्लूएफ़) के निदेशक हैंस वैरोल्म ने कहा, "मुझे लगता है कि हमने छोटे-छोटे क़दम तो आगे बढ़ाए हैं लेकिन जिस की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी वही नहीं हुआ. जब दुनिया भर के देशों के मंत्री यहाँ पहुँचे तो उनसे बड़ी उम्मीदें थीं लेकिन कुछ हो न सका. लगता है कि यह राजनीतिक इच्छाशक्ति का सवाल है."
न यह तय हो सका कि इस विषय पर चर्चा कब तक पूरी कर ली जाए और न यह कि चर्चा कब शुरु की जाए. अब इसे लेकर चिंता यह है कि पहली क्योतो संधि की अवधि ख़त्म हो जाएगी लेकिन भविष्य के लिए कोई ठोस लक्ष्य निर्धारित नहीं होंगे.
विकासशील देशों की चिंता यह थी कि उन पर ग्रीनहाउस गैसों का रिसाव रोकने के लिए दबाव बढ़ेगा लेकिन वे बाजी मार ले गए और यह तय हुआ कि न्यूनतम परीक्षण से काम चले.
पर्यावरणवादियों को बेलारुस को क्योतो संधि में शामिल किए जाने के प्रस्ताव से भी चिंता हुई है.
इस प्रस्ताव का मतलब यह है कि बेलारूस को क्योतो संधि के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता बिना ग्रीनहाउस गैसों का रिसाव कम किए मिल जाएगी.
एक सकारात्मक फ़ैसला ज़रुर हुआ कि अफ़्रीकी देशों को स्वच्छ ईंधन जुटाने के लिए आर्थिक मदद पर सहमति बन गई.