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गुरुवार, 14 सितंबर, 2006 को 14:05 GMT तक के समाचार

आर्कटिक ग्लेशियर का पिघलाव

नासा के सेटेलाइट ने 2004 और 2005 के दौरान उत्तर ध्रुवीय यानी आर्कटिक महासागर के ग्लेशियर में ख़तरनाक बदलाव देंखे हैं. यहाँ के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं.

ग़ौरतलब है कि पूरी दुनिया के ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में हैं और तेज़ी से पिघल रहे हैं लेकिन आर्कटिक समुद्र के ग्लेशियर के पिघलने की गति काफ़ी तेज़ हो गई है.

ये ग्लेशियर साल भर बर्फ से ढके रहते हैं लेकिन उनका क्षेत्रफल 14 प्रतिशत कम हुआ है जो पाकिस्तान या तुर्की के क्षेत्रफल के बराबर बैठता है.

पिछले कुछ दशकों में गर्मियों के मौसम में ग्लेशियर घटने की यह गति मात्र 0.7 प्रतिशत रही है.

विशेषज्ञों का मानना है 2005 में चली बेहद तेज़ हवाएँ इसके लिए ज़िम्मेदार हो सकती हैं. हालाँकि ग्लोबल वार्मिंग मुख्य कारणों में से एक हो सकता है.

यह ताज़ा शोध जियोफ़िज़िकल शोध लैटर नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. रिपोर्ट के अनुसार विश्व के अन्य क्षेत्रों की तुलना में आर्कटिक क्षेत्र दोगुनी तेज़ी से गर्म हो रहा है.

सालाना पिघलाव

हाल में हुए शोधों में बताया गया है कि गर्मी में भी आर्कटिक क्षेत्र बर्फ से ढका होता है लेकिन क्षेत्रफल सिकुड़ जाता है. वर्ष 2005 के समय यहां के ग्लेशियर का क्षेत्रफल सबसे कम रिकार्ड किया गया था.

वर्ष 1978 (इस साल से सेटेलाइट के ज़रिए आँकड़े उपलब्ध होने लगे थे) से अब तक लिए गए आँकड़ों में यह सबसे ज्यादा था.

नासा की केलीफोर्निया स्थित जेट पैपुलेशन लाइब्रोटरी के सन निगहम इस शोध के प्रमुख हैं. उनका कहना है कि 2004-2205 में हुआ यह बदलाव काफी बड़ा है. इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इस दौरान ग्लेशियर की बर्फ का वह हिस्सा भी पिघला है जिसकी परते कई साल पहले जमी थी.

नासा के पास 1999 से ग्लेशियर की बर्फ पिघलने के सही आँकडे हैं तब से लेकर अब तक के समय की तुलना की जाए तो तो यहाँ की बर्फ हर दस साल में 6.6 से लेकर 7.8 प्रतिशत तक पिघली है. इस तरह देखा जाए तो एक साल में 14 प्रतिशत पिघलना. पिछले सालों की तुलना में यह 18 गुणित ज़्यादा पिघली है.

अब सवाल यह उठता है कि इसका कारण क्या रहा. विशेषज्ञ मानते हैं कि इस दौरान इस क्षेत्र में काफ़ी तेज़ हवाएँ चली हैं जो पहले नहीं देखी गई. इस हवा के कारण बड़ी मात्रा में पुरानी बर्फ के टुकड़े पूरब से उड़ कर पश्चिमी क्षेत्र में चले गए. इस बदलाव से नुक़सान का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सका है.

साथ ही ग्लोबल वार्मिंग भी बर्फ पिघलने का मुख्य कारण है. गौरतलब है कि बर्फ की उपरी तह सूरज की रोशनी को परावर्तित करती है. इस क्रिया में काफी बर्फ पिघलती है...

विशेषज्ञों का कहना है कि इसलिए यदि ग्लेशियरों को पिघलने से बचाना है तो ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटना होगा.