गुरुवार, 31 अगस्त, 2006 को 15:00 GMT तक के समाचार
यदि आप ज़रूरत से ज़्यादा ग़ुस्सा करते हैं तो सचेत हो जाइए. अधिक ग़ुस्सा आपका जिगर ख़राब कर सकता है.
अमरीका में हुए नए शोध से यह तथ्य सामने आया है और ये शोध ‘जनरल थोरेक्स’ में प्रकाशित हुआ है.
अमरीका में डॉक्टरों की एक टीम ने सेना में कायर्रत 670 लोगों पर अध्ययन किया. इससे यह तथ्य सामने आया है कि ग़ुस्सैल व्यक्ति का जिगर ख़ुशमिज़ाज व्यक्ति के जिगर की तुलना में ज़ल्दी ख़राब होता है.
इसके साथ ही यह बात भी सामने आई है कि ग़ुस्सैल व्यक्ति के जिगर के काम करने की क्षमता भी आम लोगों के जिगर से कम होती है.
शोध पत्र में कहा गया है कि इस शोध से जिगर से संबंधित बीमारियों को सुधारने के नए उपाय मिलेंगे.
इससे पहले 1986 में कुछ लोगों के एक समूह से कई सवाल पूछ कर उनके भावनात्मक स्तर का पता लगाने की कोशिश की थी. इस दौरान पता चला था कि ‘इमोशनल स्टेट्स’ जिगर को काफी हद तक प्रभावित करता है.
प्रमुख हावर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ रोसलैंड का कहना है कि ताज़ा शोध से 1986 में मिली जानकारी और पुख़्ता हो गई है. शोध में कहा गया है कि ग़ुस्से के कारण क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पुलमोनरी, कार्डियोवास्कुलर जैसी बीमारियाँ होने की संभावना बढ़ जाती है.
ख़ास तथ्य
लेकिन वे यह भी कहती हैं कि शोध में शामिल पूरा समूह सेना से संबंधित था. साथ ही वे ग़रीब तबके से संबंधित थे इसलिए इसे आम लोगों के बड़े समूह के लिए पूरी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है.
शोध के मुताबिक अधिक ग़ुस्सा शरीर के हार्मोन संतुलन को ख़राब कर सकता है जिससे शरीर के दूसरे अंगो पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
डॉक्टर रोसलैंड राइस सलाह देती हैं, “स्वास्थय सलाहकारों को लोगों को बताना चाहिए कि भावनात्मक स्थिति आपके जिगर को प्रभावित कर सकती है. इसकी सहायता से जिगर संबंधित बीमारियों के संबंध में सोंचने की नई दिशा मिलेगी.”
ब्रिटिश थोरोसिस सोसायटी के प्रवक्ता और जिगर विशेषज्ञ डाक्टर जॉन मूरो गिलोन का कहना है यह रोमांचित करने वाली ख़बर है कि जिगर और ग़ुस्से का एक दूसरे से संबंध है.
इसके साथ ही यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि शोध से यह साबित नहीं हुआ है कि जिगर की ख़राबी का कारण ग़ुस्सा ही है या थकान भी इसका मुख्य कारण हो सकती है.
हाँ, यह तथ्य स्पष्ट हो गया है कि दिमाग़ और शरीर का एक दूसरे से गहरा नाता है.