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लेबनान में लड़ाई से पर्यावरण संकट

लेबनान में जारी इसराइली हमलों में जान-माल के भारी नुक़ासन के साथ-साथ पर्यावरण संकट भी उत्पन्न हो गया है जिस पर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने चिंता जताई है.

13 और 15 जुलाई के बीच लेबनान की राजधानी बेरुत के जिएह बिजलीघर पर इसराइल ने कई हमले किए.

यूएनईपी के मुताबिक इसराइली बम हमलों के बाद समुद्र के किनारे स्थित जिएह बिजलीघर के कई टैंक नष्ट हो गए. और इन टैकों में भरे ईंधन का रिसाव शुरू हो गया.

यह तेल समुद्री पानी में 80 किलोमीटर के दायरे में फैल चुका है. स्थानीय पर्यावरण संगठनों के अनुसार इससे पर्यावरण को भारी नुक़सान हो सकता है.

एक अनुमान के मुताबिक तेल का फैलाव 1989 में अलास्का में एक्सन वाल्देज टैंकर से हुए रिसाव जितना है.

संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन समुद्र की ओर तेल का बहाव रोकने में लेबनान सरकार की मदद कर रहे हैं.

यूएनईपी के कार्यकारी निदेशक एशिम स्टीनर ने बताया, "लेबनान सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय मदद माँगी थी. हम हर संभव मदद कर रहे हैं."

संकट

लेबनानी पर्यावरण मंत्रालय के एक अधिकारी बर्ज हत्जियान का कहना है, "हम जो देख रहे हैं वो एक तेल टैंकर के डूबने जैसा हादसा है. लगभग 20 से 30 हज़ार टन तेल समुद्र की तलहटी में जा चुका है."

इसे लेबनान के इतिहास में सबसे बड़ा पर्यावरण संकट माना जा रहा है.

पर्यावरण संगठन ग्रीन लाइन के अनुसार तलहटी में तेल जमा होने से ट्यूना मछलियों के अस्तित्व पर असर पड़ेगा. ट्यूना छिछले पानी के नीचे ही अंडे देती है.

साथ ही छोटे कछुओं का जीवन ख़तरे में पड़ सकता है. यहाँ हरे कछुए पाए जाते हैं जिनकी संख्या दुनिया में क़ाफी कम है.

यूएनईपी के मुताबिक तेल रिसने से स्थानीय पर्यटन और मछली पालन उद्योग में लगे लोगों की आजीविका भी प्रभावित हो सकती है.