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खाल के रंग का रहस्य सुलझा

वैज्ञानिकों ने उस जीन का पता लगा लिया है जिससे हज़ारों वर्ष पूर्व धरती पर मौजूद भारी भरकम जानवरों के खाल का रंग निर्धारित होता था.

उस समय अस्तित्व में रहे टेढ़ी मेढ़ी सूँड वाले जानवरों के खाल गहरे भूरे रंग के थे और अन्य जानवरों के खाल अदरक के रंग जैसे थे.

इस तथ्य की जानकारी हाथी जैसे भारी-भरकम जानवर की हड्डी के अध्ययन से मिला है.

यह हड्डी साइबेरिया में मिली थी. वैज्ञानिकों के मुताबिक़ इस तरह के जानवरों का अस्तित्व लगभग 43 हजार वर्ष पहले रहा होगा.

शोधकर्ताओं ने 'साइंस' पत्रिका में प्रकाशित लेख में कहा गया है कि एमसी1आर नामक जीन से ऐसे जानवरों के खालों का रंग निर्धारित होता था.

शोध के मुताबिक अभी भी कुछ स्तनधारी प्राणियों के बालों का रंग इसी जीन से नियंत्रित होता है.

मनुष्यों में अगर इस जीन की सक्रियता क़ाफी कम हो जाए तो बाल लाल रंग के हो जाते हैं.

दूसरी ओर इस जीन की निष्क्रियता से कुत्तों, चूहों और घोड़ों के बालों का रंग पीला पड़ जाता है.

रंग निर्धारण

अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम ने 43 हजार वर्ष पहले के जानवर की प्राप्त हड्डी का डीएनए लिया तो उससे दो तरह के एमसी1आर जीन का पता चला.

जर्मनी स्थित मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फ़ॉर इवोल्यूशनरी एंथ्रोपॉलॉजी के जीव विज्ञानी शोधकर्ताओं की टीम में शामिल डॉक्टर माइकल हॉफ़रीटर ने कहा कि जीन विश्लेषण से पता चला कि इसका एक समूह सक्रिय था और दूसरा तुलनात्मक रुप से कम सक्रिय था.

वैज्ञानिकों का कहना है कि रंग निर्धारण की प्रक्रिया में अभी भी कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है.

इससे स्पष्ट है कि जिन जानवरों में इस तरह के जीन का एक समूह सक्रिय और दूसरा आंशिक रुप से सक्रिय होता है उनके खालों का रंग काला या गहरा भूरा होगा.

इसी पत्रिका के एक अन्य शोध रिपोर्ट के मुताबिक़ समुद्री किनारों पर पाए जाने वाले चूहों के रंग भी एमसी1आर जीन से ही निर्धारित होते हैं लेकिन कहीं-कहीं इनके रंगों में अंतर भी दिखाई देता है.

जैसे फ़्लोरिडा के समुद्री तट पर पाए जाने वाले चूहों का रंग पीला होता हैं जो रेत में अन्य परजीवी जानवरों से उनकी रक्षा करने में मददगार साबित होता है.

वहीं फ़्लोरिडा के भीतरी इलाक़ों में पाए जाने वाले चूहों का रंग थोड़ा गहरा होता है.