सोमवार, 27 फ़रवरी, 2006 को 01:30 GMT तक के समाचार
फ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, भोपाल
मध्यप्रदेश के बैतूल ज़िले के कसई गाँव में भारत का सबसे पहला गैसीफ़ायर पावर प्लांट लगाया गया है.
कुछ महीनों पहले ही स्थापित जंगली लकड़ियों और पत्तों से चलने वाले इस बिजली प्लांट ने इस गाँव के जीवन में एक नई रोशनी ला दी है.
सतपुड़ा के जंगल के भीतर बसे इस गाँव में चंद महीनों पहले तक शाम होने का मतलब था किरोसीन से जलने वाली लालटेन और डिबिया की टिमटिमाती रोशनी और सन्नाटा.
अब सन्नाटे को तोड़ती वालीबॉल पर पड़ रही हाथों की आवाज़ देर रात तक यहाँ गूंजती रहती हैं.
मनोरंजन
अंधेरे और सन्नाटे से भरे जंगल की 10-12 किलोमीटर की ऊबड़-खाबड़ सड़क पर सफ़र के बाद पास कहीं से कहकहों और वॉलीबॉल खेलने की आवाज़ें इस बात का एहसास दिला देती है कि कसई अब बस आ ही गया है.
रात के अंधेरे में हैलोजन बल्बों से उजाला करके 15-20 लोग वॉलीबॉल का मजा ले रहे हैं.
गाँव के भीतर, सरपंच के घर, टीवी के सामने जमा भीड़ दूसरे ही आनंद में खोई है.
वृद्ध संतू, जिन्होंने इससे पहले जीवन में कभी सिनेमा नहीं देखा था, अब हेमामालिनी, श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित को पहचानने लगे हैं. टीवी के साथ वीसीआर पर देखी गई फ़िल्मों से.
10वीं में पढ़ने वाले जग्गू जिन्हें जासूसी सीरियल 'जासूस विजय' बहूत पसंद हैं, कहते हैं कि अब वह रात में भी दो-तीन घंटे ज़्यादा पढ़ाई कर पाते हैं और वह भी टीवी देखने के अलावा. हालांकि टीवी देखने पर बाबा-अम्मा उन्हें डॉटते हैं.
इसके अलावा लोगों को जंगली जानवरों से भी बड़ी राहत मिली है.
भाकतू जवलकर कहते हैं, "अंधेरे में भालू, सियार और तेंदुए हमारे जानवरों को खींचकर ले जाते थे जिससे हमें बड़ा नुकसान होता था. आग का अलाव इन खतरनाक जंगली जानवरों को दूर रखने के लिए काफी नहीं था."
55 घरों के इस गाँव के लोगों का मुख्य पेशा गाय-भैसों का दूध बेचना है क्योंकि गाँव में पानी की कमी के कारण खेती काफी मुश्किल हैं.
विवाद
कुछ पर्यावरणविदों का कहना हैं कि लकड़ी के इस्तेमाल के कारण ऐसी परियोजना जंगल की बर्बादी को और बढ़ावा देंगी.
इस प्रोजेक्ट के तकनीकी सलाहकार एमके देब इस भय को ख़ारिज करते हैं.
उनका कहना हैं कि संयंत्र को चलाने के लिए प्रत्येक परिवार को एक दिन में सिर्फ़ एक किलो लकड़ी ही देनी हैं और प्लांट के कारण जानवरों को दूर रखने के लिए अलाव वगैरह जलाने की आवश्यकता भी कम हुई है जिससे लकड़ी की बचत ही हो रही है.
हालांकि देब परियोजना की वित्तीय सफलता पर की गई चिंता का जवाब उतने ज़ोरदार तरीके से नहीं दे पाते.
कसई स्थित गैसीफ़ायर प्लांट पर आने वाला खर्च प्रत्येक परिवार से लिए गए 70 रूपए महीने और आम चक्की से आने वाले किराए से चलता हैं मगर इसमें से प्लांट चालने वाले तीन गाँव के युवकों की तनख़्वाह के बाद थोड़े ही पैसे बच पाते हैं.
लोग यह भी पूछ रहे हैं कि अगर प्लांट में बड़ी ख़राबी आ गई तो फिर उसे ठीक करने का पैसा कहाँ से आएगा?
इसपर देब का कहना हैं कि सरकार ने भविष्य में कसई में एक दूध ठंडा करने वाला प्लांट लगाने का फ़ैसला किया हैं जिससे आने वाला किराया प्लांट मेंटेनेंस में मदद करने के साथ-साथ गाँववालों को रोज़गार भी दे पाएगा.
लेकिन जानकारों का कहना हैं कि सरकार क्या उन सभी 25 हज़ार गाँवों के लिए ऐसा कर पाएगी जो दूर दराज हैं और जहाँ बिजली पहुँचाने का प्लान हैं.