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'गिद्ध बचाने के लिए जानवरों की दवा बदलें'

एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि यदि भारत में लगातार विलुप्त हो रहे गिद्धों को बचाना है तो जानवरों को दी जाने वाली दवा को बदलना होगा.

इसमें कहा गया है कि इस दवा को खाने वाले जानवरों का मांस खाकर पिछले 15 सालों में गिद्ध की प्रजाति ख़त्म हुई है.

वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि जानवरों को डायक्लोफ़ेनाक नाम का दर्दनाशक देने की जगह मेलोक्सिकैम दी जानी चाहिए जो जानवरों को नुक़सान भी नहीं पहुँचातीं.

सर्वेक्षण रिपोर्ट पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ़ साइंस ने प्रकाशित की है.

वैसे तो गिद्ध भारतीय समाज में एक उपेक्षित सा पक्षी है लेकिन साफ़-सफ़ाई में इसका सामाजिक योगदान बहुत महत्वपूर्ण है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गिद्धों के विलुप्त होने की रफ़्तार यही रही तो एक दिन ये सफ़ाई सहायक भी नहीं रहेंगे.

जैसा कि वे बताते हैं 90 के दशक के शुरुआत में भारतीय उपमहाद्वीप में करोड़ों की संख्या में गिद्ध थे लेकिन अब उनमें से कुछ लाख ही बचे हैं.

विशेषज्ञ बताते हैं कि उनकी संख्या हर साल आधी के दर से कम होती जा रही है.

महंगा विकल्प

और इसका कारण है डायक्लोफ़ेनाक, जो कि जानवरों को दी जाने वाली एक दर्दनाशक दवा है और 90 के दशक से ही जानवरों को दी जा रही है.

इस दवा को खाने के बाद जो जानवर मर गए उनके मांस को खाकर गिद्धों की प्रजाति भी ख़त्म होने लगी.

वैज्ञानिकों का दावा है कि इस दवा का जो विकल्प ढूंढ़ा गया है उसका नाम मेलोक्सिकैम है और यह जानवरों और गिद्धों दोनों के लिए नुक़सानदेह नहीं है.

इस दवा की एक ही दिक्क़त है कि ये फिलहाल दोगुनी महंगी है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दवा को सस्ता करना अब सरकारों के हाथों में होगा.

वे जल्दी ही इस संबंध में भारतीय अधिकारियों से भी मिलने वाले हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि गिद्धों को न केवल एक प्रजाति की तरह बचाया जाना ज़रुरी है बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी ज़रुरी है.

वे चेतावनी दे रहे हैं कि गिद्ध नहीं रहे तो आवारा कुत्तों से लेकर कई जानवरों तक मरने के बाद सड़ते पड़े रहेंगे और उनकी सफ़ाई करने वाला कोई नहीं होगा और इससे संक्रामक रोगों का ख़तरा बढ़ेगा.