गुरुवार, 01 दिसंबर, 2005 को 05:37 GMT तक के समाचार
गुरूवार, एक दिसंबर को विश्व एड्स दिवस के अवसर पर एड्स के प्रसार को रोकने के लिए बनी संयुक्त राष्ट्र की संस्था ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बीमारी की रोकथाम के लिए नए सिरे से प्रयास करने का आह्वान किया है.
संयुक्त राष्ट्र एड्स कार्यक्रम का कहना है कि एचआईवी संक्रमण की बढ़ती संख्या पर लगाम लगाने का एकमात्र उपाय इस रोग के वाहक वायरस का हर तरफ़ से सामना करना है.
आज एचआईवी की पहचान हुए लगभग 25 वर्ष हो चुके हैं और इस दौरान एड्स एक विश्वव्यापी चुनौती बन चुका है.
इस वर्ष इस रोग के विषाणुओं से संक्रमित लोगों की संख्या चार करोड़ से ऊपर जा चुकी है.
1981 में पहली बार इस बीमारी का पता चला था और इससे तबसे लेकर अब तक दो करोड़ से अधिक लोग काल के ग्रास बन चुके हैं.
साथ ही ये आशा कि इस रोग के टीके जल्दी विकसित कर लिए जाएँगे, वो भी विफल साबित हुई है.
वहीं संयुक्त राष्ट्र का 'थ्री बाई फ़ाइव' लक्ष्य भी पीछे रह गया है जिसके तहत वर्ष 2005 तक 30 लाख लोगों तक एड्स का सामना करनेवाली दवाएँ पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया था.
आह्वान
संयुक्त राष्ट्र एड्स कार्यक्रम के निदेशक पीटर पीओट का कहना है कि ऐसा नहीं करना ये स्वीकार कर लेने के समान होगा कि एचआईवी संक्रमण और एड्स संबंधी मौतों की संख्या रोकने के लिए किए जानेवाले अंतरराष्ट्रीय प्रयास सदा पीछे रहेंगे.
विश्व एड्स दिवस पर उन्होंने एक बयान में कहा है,"हमें महिलाओं के द्वारा नियंत्रित की जानेवाली रोग की रोकथाम की तकनीकों, प्रभावी नए उपचार और एचआईवी के लिए एक टीके के विकास के काम में तेज़ी लाने के लिए जो भी हो सकता है करना चाहिए".
संयुक्त राष्ट्र के एड्स कार्यक्रम से जुड़े लोगों की बात की जाए तो उनके शब्दों में मुश्किल इस वायरस की है जो उनसे एक क़दम आगे चलता रहता है.
वैसे उनका कहना है कि उम्मीद अवश्य है बशर्ते विश्व अपने अनुभवों से सीख लेता रहे.
संक्रमण की रोकथाम में किए जानेवाले प्रयासों से संक्रमण का चक्र टूट सकता है, और उपचार में किए जानेवाले प्रयासों से ऐसे रोगी लंबा और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं.
साथ ही इस बात को पहचानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस रोग में बहुत कुछ ग़रीबी और औरत-मर्द के अंतर पर निर्भर करता है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि एड्स एक ऐसा अभूतपूर्व संकट है जिसपर विशेष अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया होनी चाहिए, जो अभी तक दिखाई नहीं दी है.