शनिवार, 08 अक्तूबर, 2005 को 12:29 GMT तक के समाचार
वैज्ञानिकों का मानना है कि विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के कारण ये भूकंप आते हैं.
अधिकांश भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किलोमीटर अंदर होती है.
सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने और कम दबाव के कारण कमज़ोर होती है. ऐसी स्थिति में जब अचानक चट्टानें दरकती हैं तो भूकंप आता है.
एक अन्य प्रकार के भूकंप सतह से 100 से 650 किलोमीटर नीचे आते हैं.
इतनी गहराई में धरती इतनी गर्म होती है कि एक तरह से द्रव रूप में होती हैं.
हालांकि वहाँ किसी झटके या टक्कर की संभावना नहीं होती लेकिन ये चट्टानें भारी दबाव में होती हैं.
यदि इतनी गहराई में भूकंप आता है तो भारी मात्रा में ऊर्जा बाहर निकलती है.
धरती की सतह से काफ़ी गहराई में उत्पन्न अब तक का सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलीविया में रिकॉर्ड किया गया था.
सतह से 600 किलोमीटर भीतर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी.
हालाँकि वैज्ञानिक समुदाय का अब भी मानना है कि इतनी गहराई में भूकंप नहीं आने चाहिए क्योंकि चट्टान द्रव रूप में होती हैं.
लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया है कि भारतीय उपमहाद्वीप में भूकंप का ख़तरा बढ़ रहा है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत और तिब्बत एक दूसरे की तरफ़ प्रति वर्ष दो सेंटीमीटर की गति से सरक रहे हैं. इस प्रक्रिया से हिमालय क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है.
यही वजह है कि पिछले 200 वर्षों में हिमालय क्षेत्र में छह बड़े भूकंप आ चुके हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दबाव को कम करने का प्रकृति के पास सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है और वह है भूकंप.