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मंगलवार, 04 अक्तूबर, 2005 को 17:46 GMT तक के समाचार

पीएम तिवारी
कोलकाता से

बच्चे के साथ-साथ पैदा हुई एक बहस

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के एक इन्फ़र्टिलिटी क्लीनिक में रविवार को जन्मे बच्चे अर्जुन ने सामाजिक और कानूनी बहस छेड़ दी है.

लेकिन पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट उसके पिता अमित बनर्जी को अपने बेटे पर गर्व है.

अमित का अपनी पत्नी से तलाक हो चुका है. बाप बनने की चाहत में उन्होंने अपने शुक्राणु दान दिए जिसे एक महिला के अंडाणुओं के साथ मिलाने के बाद भ्रूण को दूसरी महिला के गर्भाशय में पलने के लिए डाल दिया गया.

उस महिला ने गांधी जयंती की सुबह एक बच्चे को जन्म दिया.

दोनों महिलाओं का नाम-पता पूरी तरह गोपनीय रखा गया है और उन्हें इस काम के लिए किस तरह तैयार किया गया, इन सब बातों के बारे में न तो डॉक्टर और न ही अमित बनर्जी मुँह खोलने को तैयार हैं.

बहरहाल, बनर्जी और उनके डाक्टर सुदर्शन घोष दस्तीदार इस मामले को लेकर काफी उत्साहित हैं.

दक्षिण कोलकाता स्थित घोष दस्तीदार इंस्टीट्यूट फॉर फर्टिलिटी रिसर्च में जन्मे इस बच्चे का वजन 2.8 किलो है और वह पूरी तरह स्वस्थ है.

डॉक्टर घोष दस्तीदार कहते हैं कि "आईवीएफ तकनीक में अपने 25 वर्षों के अनुभव के दौरान अमित पहले व्यक्ति थे जो इस तकनीक के जरिए पिता बनने के लिए मेरे पास आए थे."

वे कहते हैं कि "यह मामला भविष्य में इस तरीके से अकेले पिता बनने के इच्छुक लोगों के लिए एक मिसाल बन जाएगा."

अमित बनर्जी कहते हैं कि "हजारों लोगों में बाप बनने की इच्छा है लेकिन उनको विकल्प की जानकारी नहीं है."

अर्जुन की देखभाल उसकी दादी और चाचा-चाची कर रहे हैं. मंगलवार की सुबह को अमित अपने बच्चे को अस्पताल से घर ले गए.

बहस

इस मामले ने यहाँ सामाजिक और नैतिक मुद्दे पर बहस छेड़ दी है. इसके कानूनी पहलुओं की भी चर्चा हो रही है.

यहाँ वकीलों का कहना है कि जब तक बनर्जी अपने पुत्र को क़ानूनी तरीके से गोद नहीं लेते तब तक उनके पितृत्व के अधिकार को क़ानूनी मंजूरी नहीं मिलेगी.

नियमों के मुताबिक पहले जुवेनाइल वेलफेयर बोर्ड अनाथ के तौर पर इस बच्चे का जिम्मा संभालेगा, फिर उसका पिता वहाँ से उसे गोद लेगा.

जुवेनाइल वेलफेयर बोर्ड के अध्यक्ष हिरण्यमय साहा कहते हैं कि "पहले कभी ऐसा मामला सामने नहीं आया इसलिए फिलहाल इसके कानूनी पहलुओं के बारे में बताना संभव नहीं है. लेकिन गोद लेने पर खास दिक्कत नहीं होगी."

इसके अलावा, इस वक़्त जो दो महिलाएँ अनाम हैं अगर उन दोनों ने बच्चे की माँ होने का दावा कर दिया तो क्या होगा, इसका जवाब भी आसान नहीं है.

लेकिन डॉक्टर घोष दस्तीदार कहते हैं कि "एक डाक्टर के तौर पर कानूनी और सामाजिक मुद्दों पर बहस में शामिल होना उनका काम नहीं है."

वे कहते हैं कि "किसी शादीशुदा के बाप बनने के अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती. बदकिस्मती से इस मामले में पुरुष तलाकशुदा है. दुनिया में कई महिलाएं तो इस तरकीब से मां बनी हैं. तो फिर कोई पुरुष इसके सहारे पिता क्यों नहीं बन सकता?"

सामाजिक मान्यता और नैतिकता के सवालों के जवाब समाज को ही तलाशने होंगे.’

डॉक्टर की दलील है कि बनर्जी आर्थिक रूप से बच्चे की परवरिश में सक्षम हैं. इसके अलावा उनके साथ परिवार भी है. वे सवाल करते हैं कि "जिस बच्चे की मां जन्म देते समय ही मर जाती है क्या उसकी परवरिश नहीं होती?"