शुक्रवार, 05 अगस्त, 2005 को 10:52 GMT तक के समाचार
छह अगस्त 1945 को जो लोग हिरोशिमा में थे वे रेडियोधर्मी पदार्थों के संपर्क में आए और इसके बाद उनकी दुनिया बदल गई.
हिरोशिमा के उपनगर में रहनेवाली कीको ओगुरा की ज़िंदगी भी तबसे बदल गई. जब हिरोशिमा पर एटम बम गिरा तब वे छोटी बच्ची थीं.
वे कहती हैं,"मेरे शरीर पर उस बमबारी के कारण कोई दाग तो नहीं है, लेकिन हाँ मुझे डरावने सपने आते हैं".
कीको ओगुरा के जैसे लोग हिरोशिमा में हज़ारों की संख्या में हैं.
उस दिन जो बच गए उनको हिबाकुशा कहा जाता है, अब वे लोग उम्र की ढलान पर हैं.
चिकित्सा और शोध
बमबारी के बाद अमरीकियों ने ही कई महीनों तक प्रभावित लोगों की देखभाल की.
कीको बताती हैं,"कई बार गाड़ियाँ आईं और मुझे लेकर रिसर्च सेंटर चली गईं जहाँ उनलोगों ने मेरा परीक्षण किया".
चिकित्सकों और वैज्ञानिकों ने उस दिन बच गए लोगों और उनके बाल-बच्चों पर सबसे अधिक ध्यान रखा जिसका कारण भी था.
रेडियोधर्मिता के प्रभाव पर बने शोध संस्थान के डॉक्टर साइको फ़ुजिवारा कहते हैं,"ये एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ हम पता लगा सकते हैं कि रेडियोधर्मिता का मानव शरीर पर क्या प्रभाव होता है".
इसी संस्थान में काम करनेवाले अमरीकी वैज्ञानिक चार्ल्स वाल्ड्रेन के अनुसार शोध के कारण अमरीका और यूरोप के लगभग पाँच लाख ऐसे लोगों को लाभ हुआ जो रेडियोधर्मी वातावरण में काम करते हैं.
चिंता
लेकिन हिरोशिमा में जो लोग बच गए उनपर शोध की बात से अलग अब सबसे महत्वपूर्ण चिंता ऐसे लोगों के स्वास्थ्य को लेकर हो रही है.
जो लोग तब रेडियो विकिरण के संपर्क में आए थे उनकी जीनों पर प्रभाव पड़ा था.
कई लोगों के जीन तो ख़ुद ठीक हो गए लेकिन ख़तरा ये है कि अगर ये पूरी तरह ठीक नहीं हुए तो उम्र बढ़ने पर उनमें कैंसर हो सकता है.
हिरोशिमा विश्वविद्यालय में विकिरण, जैव विज्ञान और औषधि पर शोध संस्थान के डॉक्टर केन्जी कामिया कहते हैं,"ये लोग अब ऐसी उम्र में पहुँच रहे हैं जब उनमें कैंसर के पनपने की संभावना अधिक है".
ऐसा अनुमान है कि कि हिरोशिमा बमकांड में बचे हुए लोगों में कैंसर होने के मामले आनेवाले दिनों में बढ़ते जाएँगे.