गुरुवार, 24 मार्च, 2005 को 08:09 GMT तक के समाचार
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में टीबी यानी क्षयरोग (तपैदिक) का मुक़ाबला सफलतापूर्वक किया जा रहा है लेकिन अफ्रीका और यूरोप में हालात बहुत चिंताजनक हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 के बाद दुनिया भर के ज़्यादातर इलाक़ो में टीबी के मामलों में 20 प्रतिशत की कमी हुई है जबकि अफ्रीका में टीबी के मरीज़ों की संख्या में तिगुनी बढ़ोत्तरी हुई है.
गुरूवार, 24 मार्च को विश्व तपैदिक दिवस के मौक़े पर यह रिपोर्ट जारी की गई है.
संगठन का कहना है कि एचआईवी/एड्स का संक्रमण बढ़ने और ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से टीबी के मरीज़ों की संख्या और बढ़ रही है और अफ्रीका में हर साल क़रीब 17 लाख लोग टीबी की वजह से मौत के मुँह में चले जाते हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्वी यूरोप में दवाइयों का असर नहीं हो रहा है.
उधर रूस में टीबी का बैक्टीरिया इतना ताक़तवर हो चुका है कि परंपरागत दवाइयों का उस पर असर नहीं हो रहा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉक्टर ली जोंग वुक ने कहा है कि इस रिपोर्ट से यह आशा तो बंधी है कि टीबी से छुटकारा पाया जा सकात है लेकिन रिपोर्ट में एक चेतावनी भी है.
डॉक्टर ली जोंग वुक ने कहा, "हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमें अभी बहुत काम करना है."
उन्होंने कहा कि अफ्रीका में टीबी और एचआईवी/एड्स का मुक़ाबला करना तब तक मुमकिन नहीं होगा जब तक कि इन दोनों बीमारियों से एक साथ मुक़ाबला नहीं किया जाता.
'टीबी रोकिए'
विश्व स्वास्थ्य संगठन के टीबी रोकिए विभाग की निदेशक डॉक्टर मारियो रविगलॉयन का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में आधे से ज़्यादा मरीज़ों टीबी के इलाज की सुविधा हासिल नहीं है.
संगठन का कहना है कि टीबी के मरीज़ों की समुचित जाँच हो और अगर संभव हो तो एचआईवी संक्रमण के लिए या फिर एचआईवी संक्रमण के शिकार लोगों का टीबी का भी इलाज हो.
उधर ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्रालय ने टीबी को और फैलने से रोकने के लिए अगले तीन सालों के लिए पचास लाख पाउंड की राशि ख़र्च करने की पेशकश की है.
ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री हिलैरी बेन ने कहा, "यह एक बड़ी सफलता है कि हम अधिकतर क्षेत्रों में वर्ष 2015 तक टीबी का ख़ात्मा करने के अपने लक्ष्य की तरफ़ बढ़ रहे हैं."
कुछ अन्य संगठनों ने टीबी का मुक़ाबला करने के लिए ज़्यादा जागरूकता बढ़ाने का आहवान किया है.
एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी मेडिसिन्स सांस फ्रंटियर्स ने कहा है कि मौजूदा परीक्षण पद्यति क़रीब 123 साल पुरानी है, इसमें आमूलचूल बदलाव होने चाहिए और नए ज़माने की औषधियाँ बनाई जानी चाहिए.