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बुधवार, 23 मार्च, 2005 को 05:53 GMT तक के समाचार

भारत में गिद्धों को बचाने की कोशिश

दक्षिण एशिया में विलुप्त हो रहे गिद्धों को बचाने के लिए भारत सरकार ने प्रयास शुरु कर दिए हैं.

इसके तहत पशुओं को दी जाने वाली उस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया है जिसके कारण गिद्धों की मौत हो रही थी.

संरक्षण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले 12 सालों में गिद्धों की संख्या में 97 प्रतिशत की कमी आई है और वे विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए हैं.

कहा जा रहा है कि पशुओं को दर्दनाशक के रुप मे एक दवा डायक्लोफ़ेनाक दी जाती है और इस दवाई को खाने के बाद यदि किसी पशु की मौत हो जाती है तो उसका मांस खाने से गिद्धों मर जाते हैं.

भारत, पाकिस्तान और नेपाल में हुए सर्वेक्षणों में मरे हुए गिद्धों के शरीर में डायक्लोफ़ेनाक के अवशेष मिले हैं.

ब्रिटेन के रॉयल सोसायटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स में अंतरराष्ट्रीय शोध विभाग के प्रमुख डेबी पेन का कहना है कि गिद्धों की तीन शिकारी प्रजातियाँ चिंताजनक रुप से कम हुई हैं.

उनका कहना है, "हालांकि अब भारत में डायक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन भोजन चक्र से इसका असर ख़त्म होने में काफ़ी वक़्त लगेगा."

गिद्धों की भूमिका

एशियाई पर्यावरण के संतुलन में गिद्धों की बड़ी भूमिका है.

सदियों से ये गिद्ध ही मरे हुए जानवरों के अवशेषों को ख़त्म करते रहे हैं जिससे संक्रमण रुकता रहा है.

एशिया के भोजन चक्र में उनका महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन पिछले एक दशक से उनकी संख्या लगातार घटती जा रही है.

हालांकि भारत सरकार शुरुआत में कुछ हिचक रही थी लेकिन बाद में वह मान गई कि इस दवाई के कारण ही गिद्धों की मौत हो रही है.

भारत सरकार से संबद्ध नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ़ ने डायक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की थी.

बाद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे स्वीकार कर लिया और डायक्लोफ़ेनाक की जगह दूसरी दवाइयों के उपयोग को मंज़ूरी दे दी.