सोमवार, 21 मार्च, 2005 को 07:49 GMT तक के समाचार
शिल्पा कन्नन
बीबीसी संवाददाता
बाल झड़ रहे हैं, गोरापन चाहिए या मसूड़ों से परेशान हैं? डायबिटीज़ है या फिर वज़न कम करना चाहते हैं?
यदि आपका उत्तर हाँ है तो इन मुश्किलों का इलाज भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय, 11 अशोक रोड नई दिल्ली में भी उपलब्ध है.
यह पता ग़लत नहीं है, दरअसल भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा इन दिनों इन सब बीमारियों के इलाज के लिए दवा बेच रही है, जैसा कि उनका दावा है 'सनक्रीम से लेकर कैंसर के इलाज तक सब कुछ'.
पार्टी के मुख्यालय में झंडा, बैनर, बिल्ला, पोस्टर और पार्टी साहित्य के बीच आपको ये दवाइयाँ मिल जाएँगी.
इन दवाओं की ख़ासियत एक ही है कि ये सब गो-मूत्र या गोबर से बनी हैं जिसे गोरत्न का नाम दिया गया है.
इनमें है गोमूत्र से बनी गोरेपन की दवा, गंजापन और मोटापा दूर करने की दवा और गोमूत्र से ही बना 'एंटिसेप्टिक आफ़्टर शेव'.
तरह-तरह की दवा
इस दुकान को चलाने वाले संजीव इस बात पर बेहद ख़ुश हैं कि इनकी माँग आपूर्ति की तुलना में कहीं ज़्यादा है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "लोग गोरत्न से बने शैम्पू, टूथपेस्ट, अगरबत्ती से लेकर दर्दनाशक दवाई और त्वचा रोग के लिए तेल तक सब कुछ ख़रीदते हैं. पाचन, मधुमेह यानी डायबिटीज़ की दवाओं और मोटापा कम करने की गोलियों की भी मांग काफ़ी है."
वे बताते हैं कि सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ है - नहाने का साबुन. यह साबुन गोबर, गोमूत्र, चंदन पाउडर और मुलतानी मिट्टी से मिलकर बनता है.
संजीव इस साबुन की वकालत करते हुए कहते हैं, "ये पुरुषों, महिलाओं और लड़कियों में समान रुप से लोकप्रिय है. इससे त्वचा साफ़ होती है, आपको गोरा बनाती है और आप ताज़गी महसूस करते हैं."
सभी सहमत नहीं
भारत में गाय की पूजा की जाती है और दूध, दही और घी के अलावा गोमूत्र और गोबर का भी व्यापक उपयोग समाज में होता रहा है. इसे पंचगव्य कहा जाता है.
इस तरह के उत्पाद बनाने में लगी एक स्वयंसेवी संस्था प्रकृति भारती के वीरेंद्र सिंह चहल कहते हैं, "गाय भी आय का अच्छा ज़रिया हो सकती है. जिनके पास बड़ी डेयरी नहीं है उनकी सहायता हमारी संस्था करती है."
वे कहते हैं कि जब बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आयुर्वेदिक दवाएँ बेच रही हों तब ज़रुरी है कि लोग गोरत्नों से बने इन उत्पादों के बारे में जानें.
लेकिन सभी लोग उनके इस तर्क से सहमत नहीं हैं. दिल्ली में डेयरी चलाने वाले टिट्टू कहते हैं, "गोबर से सिर्फ़ दुर्गंध आती है. मेरे पास 12 गाय-भैंसें हैं और मुझे गोबर हटवाने के लिए हर दिन दो ट्रक बुलवाने पड़ते हैं."
वे बताते हैं कि एक ट्रक भर गोबर के लिए उन्हें मुश्किल से पचास-साठ रुपए मिलते हैं और ट्रक वाला इसे ले जाकर किसानों को खाद के लिए ऊँचे दामों में बेच देता है.
लेकिन भाजपा के कार्यकर्ता सिद्धार्थ सिंह गोरत्न के इन उत्पादों के प्रति आश्वस्त हैं कि वे अच्छे हैं. उनका कहना है कि उन्होंने ख़ुद भी इन सामानों का उपयोग किया है. वे बताते हैं कि साबुन को ठंड के दिनों में उपयोग करने से त्वचा में खुश्की नहीं आती.
वे बताते हैं कि पहले ही हफ़्ते ही सारा सामान बिक गया था.
वैसे दूकान पर खड़े ख़रीददार इन उत्पादों को लेकर ख़ासे उत्साहित नज़र आए.
एक ख़रीददार केशव ने कहा, "मैं पंचगव्य साबुन का इस्तेमाल करता हूँ यह बाज़ार के किसी दूसरे साबुन की तरह ही है और अच्छा है. मैं अपनी पत्नी के लिए काला तेल ख़रीदता हूँ इससे उसके बालों को फ़ायदा हो रहा है."
हालांकि सिद्धार्थ सिंह इस बात से इनकार करते हैं कि इन सामग्रियों की बिक्री के पीछे पार्टी की कोई नीति है.
वे कहते हैं कि पार्टी मानती है कि कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए इसलिए जब एक स्वयंसेवी संस्था ने प्रस्ताव रखा तो पार्टी ने उसे मान लिया.