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शुक्रवार, 27 अगस्त, 2004 को 20:43 GMT तक के समाचार

अब केले से बनेगी बिजली

ऊर्जा की कमी बहुत से देशों में चिंता का विषय है और इस पर पार पाने के लिए भी बहुत से देशों में नित नए-नए शोध होते रहते हैं.

ऑस्ट्रेलिया में ऊर्जा उत्पादन का एक बिल्कुल नयी तरीक़ा निकाला गया है और वो है सड़े हुए केलों से बिजली का उत्पादन.

ऑस्ट्रेलिया के इंजीनियरों ने एक ऐसा जनरेटर ईजाद किया है जिसमें ईंधन के रूप में केले इस्तेमाल किए जाते हैं और अब वे इस तरह का बड़ा बिजली घर बनाने की कोशिश में लगे हैं.

अभी तो हालत ये है कि ऑस्ट्रेलिया में केले की फ़सल का बड़ा हिस्सा बेकार चला जाता है क्योंकि बहुत सा केला छोटा होने या कुछ और वजहों से बाज़ार तक नहीं पहुँच पाता.

शोधकर्ताओं ने केले के सड़े हुए कचरे को बेकार जाने की बजाय उसे इस्तेमाल करने का नुस्ख़ा निकालने की ठानी और उन्हें कामयाबी भी मिल गई.

जो कुछ उन्होंने बनाया वह वाक़ई किसी चमत्कार से कम नहीं है. यानी अगर सबकुछ ठीकठाक चला तो केले के कचरे से चलने वाला यह जनरेटर 500 घरों की बिजली की ज़रूरत पूरी कर सकता है.

अगर इतना कर सकता है तो और भी कर सकता है! बस यही सोचा शोधकर्ताओं ने और अब जुट गए हैं बड़ा बिजली घर बनाने में.

कचरे के ढेर

क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग विभाग में शिक्षक बिल क्लार्क का कहना है कि जब केला उत्पादकों की परिषद ने उनसे संपर्क किया तो यह विचार ही बहुत उत्साहवर्धक था.

"सड़े हुए केले के कचरे के पहाड़ जैसे ढेरों का कोई उपयोग भी हो सकता है, और बस हम उस पर काम करने में जुट गए."

डॉक्टर क्लार्क का कहना है कि क्वींसलैंड के उत्तरी हिस्से में केला बड़ी मात्रा में मिलता है जो बिजली उत्पादन का एक अच्छा स्रोत हो सकता है.

क्वींसलैंड में हर साल क़रीब बीस हज़ार टन केले का उत्पादन होता है जिसमें से क़रीब एक तिहाई बाज़ार तक नहीं पहुँच पाता है.

आमतौर पर साफ़ केला नहीं होने की वजह से उसे यूँ ही फेंक दिया जाता है जिससे ज़मीन को भी नुक़सान होता है.

इस नुस्ख़े के तहत दरअसल केले को बंद बक्सों में सड़ाया जाता है और उससे जो मीथेन नाम की गैस निकलती है वह बिजली जनरेटर में ईंधन का काम करती है.

अब डॉक्टर क्लार्क के दल ने अपनी प्रयोगशाला में केले के कचरे का इस्तेमाल ईंधन के तौर पर करके सफलतापूर्वक बिजली उत्पादन किया है और अब व्यावसायिक स्तर पर बिजली घर बनाने पर विचार किया जा रहा है.

हालाँकि डॉक्टर क्लार्क अभी बहुत आश्वस्त नहीं हैं कि क्या व्यावसायिक स्तर पर बिजली उत्पादन के लिए यह ईंधन का एक अच्छा स्रोत हो सकता है या नहीं.

"इसलिए हमारा शोध मुख्य रूप से इस पर केंद्रित रहेगा कि केलों को सड़ाकर मीथेन बनाने में कितना समय लगेगा और कितने कचरे से कितनी मीथेन बनाई जी सकती है."

डॉक्टर क्लार्क कहते हैं कि अगले साल फ़रवरी तक उन्हें इस बारे में कोई निश्चित परिणाम मिल सकेगा कि क्या केले का कचरा बिजली उत्पादन के लिए एक भरोसेमंद ईंधन साबित हो सकता है या नहीं.