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गुरुवार, 19 अगस्त, 2004 को 11:52 GMT तक के समाचार

सलीम रिज़वी
न्यूयॉर्क से

नींद बेचने की नई दुकान

अक्सर ऐसा देखा गया है कि दिन भर दफ़्तर की कुर्सी पर बैठे-बैठे कई लोग थक जाते हैं और बहुत से काम करते-करते ऊँघ रहे होते हैं.

अब ऐसे कामकाजी लोगों की थकान मिटाने और नींद पूरी करने का एक नया तरीक़ा ईजाद किया गया है.

अमरीका में अब दफ़्तरों में काम करने वालों के आराम के लिए सोने की दुकानें खोली गई हैं.

मेट्रोनैप्स नाम की नींद पूरी करने की इस नई दुकान में लोग अपने भोजन के अवकाश के समय 20 मिनट के लिए आते हैं.

वे यहाँ अपनी थकान मिटाकर और खाना खाकर वापस अपने काम पर पहुँच जाते हैं.

शुरूआत

इस नए क़िस्म की आरामगाह को खोलने का श्रेय बांग्लादेशी मूल के अरशद चौधरी को जाता है.

अरशद पहले ख़ुद न्यूयॉर्क के एक बैंक में काम करते थे इस शुरूआत के बारे में कहते हैं,"मैंने अपने दफ़्तर में देखा कि लोग बहुत थके-थके से लगते हैं और कुछ ऊंघते रहते हैं. कुछ लोग तो नींद पूरी करने के लिए शौचालय में चले जाते थे. मुझे लगा कि दफ़्तर में काम करने वालों के लिए कोई ढंग की जगह नहीं है."

उसके बाद अरशद ने अमरीका में कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी में दो साल इसी विषय पर पढ़ाई की कि लोगों को दिन में थकान और नींद का एहसास क्यों होता है और इसका इलाज क्या है.

अरशद चौधरी ने सोचा कि कयों न इसे एक धंधा ही बना लिया जाए. फिर वह लग गए एक ख़ास तरह की कुर्सी डिज़ाइन करने में.

एक साल की मेहनत रंग लाई और अरशद ने अपने एक दोस्त के साथ न्यूयॉर्क की एम्पायर स्टेट बिल्डिंग में आठ कुर्सियों वाला अपना एक स्लीपिंग सेंटर खोला.

मेट्रोनेप्स

अब लोग अपने दफ़्तर की खाने की छुट्टी के समय सीधे मेट्रोनेप्स में आ जाते हैं.

आते ही वे कुर्सी के अंदर घुसते हैं और नींद की गोद में पहुँच जाते हैं, जब सोकर उठे तो पूरी ताज़गी के साथ खाना खाया और वापस काम पर लौट गए.

अरशद कहते हैं, “इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में लोग मशीन बन गए हैं और आराम करना ही भूल गए हैं. हम मेट्रोनेप्स में लोगों की यही ज़रूरत पूरी करते हैं.”

लोगों को यह तरीक़ा पसंद भी आया है.

एक अमरीकी बेन स्किनर उत्साह से बोले,"मैं तो बहुत ताज़ा महसूस कर रहा हूं. मुझे यह तरीक़ा बहुत पसंद आया. काश ऐसे और भी केंद्र खुल जाएँ. इससे बहुत आराम मिलता है और आप अपना काम ज़्यादा फ़ुर्ती और लगन से कर सकते हैं."

तकनीकी नींद

मशीन में बैठने के बाद 20 मिनट का अलार्म लगा दिया जाता है और कान में एक हेडफ़ोन के ज़रिए लोरी जैसे संगीत भी सुने जा सकते हैं जिससे जल्दी नींद आ जाए.

यही नहीं, बीस मिनट के बाद हल्की रोशनी से और हल्के कंपन के ज़रिए मशीन सोने वाले को उठाती भी है.

बीस मिनट की नींद के 14 डॉलर या क़रीब 700 रुपए लगते हैं.

अब इस सोने की मशीन के अमरीका और दुनिया के अन्य देशों से ख़रीद के ऑर्डर आ रहे हैं.

एक कुर्सी का दाम है आठ हज़ार डॉलर. ज़्यादातर बड़ी-बड़ी कंपनियॉँ और कई देशों ने इस मशीन के इस्तेमाल की इच्छा जताई है.

अरशद कहते हैं,"लोगों को यह बहुत फ़ायदे का सौदा दिखता है. जो कंपनियाँ इस कुर्सी को इस्तेमाल करना चाहती हैं उन्हें यह लगता है कि अगर उनके कर्मचारियों की सेहत अच्छी रहेगी तो वह ज़्यादा मुनाफ़ा कमा सकते हैं."

और इस ख़ास कुर्सी के लिए जिन देशों ने अपनी इच्छा दिखाई है उनमें भारत-पाकिस्तान के अलावा सिंगापुर, चीन और यूरोप के बहुत-से देश शामिल हैं.

नींद का धंधा

वैसे तो अब इस नींद के व्यापार की चर्चा बढ़ती जा रही है लेकिन कुछ लोगों को यह सब कुछ अटपटा सा लग रहा है.

न्यूयॉर्क में एक सरकारी कर्मचारी तनवीर अहमद कहते हैं,"ये हंसने वाली ही बात है कि अब सोने के लिए भी पैसे देकर मशीनी मदद का सहारा लेना पड़ रहा है. नींद को भी धंधा बना दिया गया है."

तनवीर कहते हैं कि शहरी ज़िंदगी का यह एक नया पहलू है कि नींद भी बाज़ार में बिकने लगी है.

उन्होंने कहा,"लेकिन गॉंव में आज भी किसान अपनी खेती के बीच पेड़ तले ठंडी हवा में सुखद नींद सोता है. यह सरदर्द तो शहरियों के लिए ही हैं कि सोने की जगह ढूंढिए."

बहरहाल, अरशद साहब तो अपने इस नए काम से बहुत खुश हैं और उम्मीद करते हैं कि अब एयरपोर्टों में और हाईवे रेस्त्रां में उनकी यह मेट्रोनेप्स की कुर्सी सबको सुलाने का काम जल्द शुरू करेगी और उनके धंधे को चार चांद लगाएगी.