भारतीय विज्ञान कॉंग्रेस आखिर किसके लिए है?
यह सवाल सबसे पहले दिमाग में आता है जब आप ऐसे बड़े आयोजन में हिस्सा लेते हैं.
आम तौर पर भारत के प्रधानमंत्री इसका उदघाटन करते हैं और यह पंरपरा नेहरू के ज़माने से चली आ रही है.
वैसे पहली विज्ञान कॉंग्रेस करवाई थी अंग्रेज़ों ने 1914 में, इंग्लैंड और अमरीका की विज्ञान कॉंग्रेसों की तर्ज़ पर.
आज इंग्लैंड और अमरीका में तो ये कॉंग्रेंस माध्यम होती हैं प्रेस में, मीडिया में सुर्खियों के लिए.
बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय पत्रकार पहुँचते हैं और मीडिया में प्रचार के लिए बड़ी पब्लिक रिलेशंस कंपनियों का सहारा लिया जाता है.
भारतीय विज्ञान कॉंग्रेस में इस तरह के मीडिया प्रचार का अभाव है.
और वैसे भी भारतीय मीडिया में राजनीति से बड़ी जगह और किसी विषय की होती भी नहीं.
और पाकिस्तान में सार्क सम्मलेन चल रहा हो और ऑस्ट्रेलिया में सचिन का बल्ला धूम मचा रहा हो तो फिर विज्ञान की रिपोर्टों की क्या बिसात.
हाँ, अखबारों में ज़रूर ख़बरें छप रही हैं लेकिन वो भी गिनी चुनी.
बड़े वैज्ञानिकों को यहाँ आमंत्रण है कि वे अपने शोध को प्रस्तुत करें, वैज्ञानिक यह सोचते हैं कि शायद उनकी आवाज़ सरकार तक पहुँचेगी, और विज्ञान के छात्र-पीएचडी कर रहे हज़ारों लड़के लड़कियाँ– भावी नौकरियों या ब्रेक की तलाश में यहाँ हैं.
यह सच है कि भारतीय विज्ञान ने काफ़ी प्रगति की है लेकिन यह भी सच है कि भारत आज भी पुरानी बीमारियों से जूझ रहा है.
एक तरफ़ यहाँ बात हो रही है कंप्यूटर और इंटरनेट को घर-घर तक ले जाने की और दूसरी तरफ़ यह कि आज भी भारत में होने वाली 50 प्रतिशत मौतें 22 वर्ष से कम उम्र के लोगों की होती हैं और वो भी ऐसे कारणों से जिन्हें बाक़ी दुनिया में रोका जा चुका है.
मलेरिया, टाइफॉइड, टेटनस, हैजा जैसी बीमारियाँ आज भी भारत में जानलेवा साबित हो रही हैं,
फिर भी वैज्ञानिकों और चिकित्सकों में एक बात तो कमाल की है, और वो है उनका उत्साह और सकारात्मक सोच.
अकेले भी काम करना हो तो बहुत से वैज्ञानिक हिम्मत नहीं हारते और कभी रिटायर भी नहीं होते.
अगर आप उनके उन्हीं के विषय में पूछना शुरू करें तो फिर देखिए कि कितनी देर तक आपको समझाएँगे.
चंडीगढ़ में पंजाब विश्विद्यालय और इंस्टीट्यूट ऑफ़ माइक्रोबियल टेक्नोलोजी संयुक्त रूप से इस कॉंग्रेस को इस साल आयोजित कर रहे हैं.
और जैसी कि उम्मीद की जा सकती है कि पैसों की कमी तो है ही. रहने की व्यवस्था से लेकर टीए, डीए में हाय-हाय और उपर से हड्डियों को चीरने वाली ठंड.
इसके बावजूद उनके हौसले बुलंद हैं और यक़ीन मानिए जब कोई लेक्चर आपको बाँधता है तो किसी रोचक नाटक से कम नहीं होता.
ख़ास बात यह है यहाँ जो कुछ कहा जा रहा है वो कल्पना नहीं है सच्चाई है.
और हाँ, एक बात और जो सभी वैज्ञानिकों को यहाँ जोड़ती है वो है क्रिकेट.
कॉंग्रेस के पहले दिन, पहले प्लेनरी सेशन में पहले भारत के स्कोर पर चर्चा और फिर शुरू हुई बाक़ी कार्रवाई. और यहाँ का नारा है–जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान और जय क्रिकेट.