विश्व एड़्स दिवस के मौक़े पर संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के सबसे ग़रीब देशों के एचआईवी से प्रभावित तीस लाख लोगों को ऐंटी-रेट्रोवायरल दवाइयाँ मुहैया कराने की योजना के विवरण दिए हैं.
इस योजना में साढ़े पाँच अरब डॉलर का ख़्रर्च आएगा और संयुक्त राष्ट्र का इरादा इसे अगले दो वर्ष में पूरा कर लेने का है.
इन दवाइयों को कभी-कभी मिले-जुले उपचार का नाम दिया जाता है और इनकी बदौलत एचआईवी से प्रभावित लोग एड्स का शिकार हुए बिना आमतौर से सामान्य जीवन गुज़ार लेते हैं.
एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में चार करोड़ लोग एचआईवी से प्रभावित हैं.
विश्व एड्स दिवस के मौक़े पर अपने संदेश में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉक्टर ली जौंग वुक ने कहा कि एड्स से निबटना दुनिया के सामने अब तक की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संबंधी चुनौती है.
उन्होंने कहा, "दुनिया के करोड़ों लोगों का जीवन दाँव पर है. इस नीति का उद्देश्य ऐसे व्यापक और अपारंपरिक उपाय करना है जिससे इन लोगों का जीवन बच जाए".
अधिकारियों का कहना है कि यदि एड्स को बढ़ने से रोकना है और करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बचानी है तो तथाकथित 3x5 अभियान लाज़मी है.
एचआईवी से प्रभावित तीन लोगों में से एक सब-सहारा दक्षिण अफ़्रीका में रहते हैं.
और इस बीमारी से मरने वाले चार में से तीन की मौतें भी इसी क्षेत्र में होती हैं.
लगभग चौदह हज़ार लोग रोज़ इस बीमारी से प्रभावित होते हैं.
इस वर्ष ही इससे मरने वालों की संख्या तीस लाख थी.
अन्य देश भी...
पिछले हफ़्ते जारी यूएनएड्स की रिपोर्ट में कहा गया था कि सब-सहारा क्षेत्र में इसका प्रकोप है लेकिन अन्य देश भी इस ख़तरे से अछूते नहीं हैं.
भारत, चीन, इंडोनेशिया और रूस में यह रोग तेज़ी से बढ़ रहा है और इसके मुख्य कारण इंजेक्शन और असुरक्षित यौन संबंध हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके विस्तार को रोकने के लिए एहतियाती कार्यक्रम शुरू करने की ज़रूरत है.
इस नए अभियान को संयुक्त राष्ट्र की तीन एजेंसियों ने मिल कर शुरु किया है-विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूएनएड्स और एड्स, टीबी और मलेरिया से मुक़ाबले के लिए गठित ग्लोबल फ़ंड.
डॉक्टर ली ने चेतावनी दी है कि यह नई नीति तभी कारगर साबित होगी यदि उसे सरकारों, सहायता एजेंसियों और मरीज़ों का समर्थन मिला.
उन्होंने कहा, "यह दुनिया भर की स्वास्थ्य समस्या है".