साबुन या हैंडवॉश- किससे जल्दी ख़त्म होता है कोरोना वायरस

हाथ धोती बच्ची
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लॉकडाउन के दौर में कोविड-19 से लड़ाई के लिए मास्क पहनना और सामाजिक दूरी, साबुन और पानी का अहम योगदान रहा है.

ये अब ऐसी चीजें बन गई हैं जिन्हें याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती है और शरीर और दिमाग इन्हें आदतों में ले आए हैं. लेकिन, ये आदत अब से छह महीने पहले शायद ही किसी को रही हो.

मास्क, सेल्फ-आइसोलेशन और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे कोरोना के खिलाफ हथियारों के बीच हैंडवॉश को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है.

फरवरी से पूरी दुनिया में कोरोना वायरस के एक स्वास्थ्य आपात के तौर पर उभरने के साथ ही स्वास्थ्य एजेंसियां लोगों को लगातार इस वायरस से बचने के उपाय बता रही हैं.

एक्सपर्ट्स, डॉक्टरों और सरकारी अधिकारियों की ओर से बार-बार बताया गया है कि हाथों को गुनगुने पानी से कम से कम 20 सेकेंड्स तक दिन में कई दफा धोएं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक ग्राफिक पब्लिश किया है. इसमें हाथ धोने के सही तरीके को दिखाया गया है.

वीडियो कैप्शन, हाथों को सही से कैसे धोया जाए

हाथ धोने की सलाह भूलने लगे लोग

छह महीने में संक्रमण के बढ़ते मामलों और लॉकडाउन को लेकर बनी एक कनफ्यूज्ड ग्लोबल तस्वीर ने हाथ धोने की सलाह को हाशिए पर ला दिया है.

मास्क पहनने और फेस कवर करने के खिलाफ कुछ लोगों में बढ़ते गुस्से के बीच हाथ धोने को लेकर बनी जागरूकता धीरे-धीरे घटती जा रही है.

एक इथियोपियाई स्टडी में कहा गया है कि अस्पताल जाने वाले 1,000 लोगों में से 1 फीसदी से भी कम लोग ऐसे हैं जो कि ठीक ढंग से हाथ धोते हैं. लेकिन, क्या सलाह बदल दी गई थी?

एक्सपर्ट्स कहते हैं, ऐसा बिलकुल नहीं हुआ है. बल्कि, वे इसे दोगुना असरदार मानते हैं.

बोस्टन की नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री और केमिकल बायोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर थॉमस गिलबर्ट कहते हैं कि कोरोना वायरस के केमिकल मेकअप को खत्म करने का सबसे आसान तरीका सस्ते साबुन और गर्म पानी से हाथ धोना है.

वे कहते हैं, "इन वायरस में मेंब्रेंस होती है जो कि जेनेटिक पार्टिकल्स को घेरे होती है जिसे लिपिड मेंब्रेंस कहते हैं. चूंकि ये तेलीय, चिकनाईयुक्त स्ट्रक्चर होते हैं, ऐसे में इन्हें साबुन और पानी से खत्म किया जा सकता है. साबुन और पानी से इनका बाहरी खोल घुल जाता है और ह्यूमन सेल्स पर असर डालने वाले जेनेटिक मैटेरियल जो कि वायरस की कॉपियां बना लेता है, वह बह जाता है और खत्म हो जाता है."

गिल्बर्ट कहते हैं, "मैंने अभी तक हाथ धोने में लगने वाले वक्त को कम करने जैसा कुछ नहीं सुना है."

वे कहते हैं, "आपको अपने हाथ गीले करने चाहिए, साबुन लेना चाहिए और तसल्ली से 20 सेकेंड्स तक हाथों को अच्छी तरह से साफ करना चाहिए. कोई भी कोना या जगह अछूती नहीं रहनी चाहिए."

गिल्बर्ट कहते हैं कि इतने वक्त में लिपिड मेंब्रेन और साबुन के बीच रासायनिक क्रिया पूरी हो जाती है.

वे कहते हैं कि इसके अन्य फायदे भी होते हैं. साबुन मैटेरियल को साफ करने में भी अच्छा काम करता है. वे कहते हैं कि अगर गर्म पानी और साबुन से ये काम करते हैं तो ऐसा और जल्दी हो जाता है.

साबुन का ग्राफिक रिप्रजेन्टेशन

साबुन है जरूरी

यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ केंट के मॉलिक्यूलर साइंस के प्रोफेसर मार्टिन माइकेलिस कहते हैं कि केवल पानी इस वायरस को खत्म नहीं कर सकता है.

वे कहते हैं, "खाना बनाते वक्त अगर आपके हाथ में तेल लग जाता है तो इसे केवल पानी से साफ करना मुश्किल भरा होता है. आपको साबुन की जरूरत पड़ती है. कोरोना वायरस के लिए भी साबुन की जरूरत ठीक उसी तरह से होती है. इससे वायरस के ऊपर चढ़ा लिपिड का आवरण हट जाता है और वायरस निष्क्रिय हो जाता है."

हाथ धोने के प्रभावों को बड़े पैमाने पर हैंड सैनिटाइजर्स के इस्तेमाल ने किनारे कर दिया है.

लोग घर से बाहर जाते वक्त सैनिटाइजर्स की छोटी बोतल साथ रखते हैं. साथ ही दुकानों या दफ्तरों में जाते वक्त भी लोगों के हाथ सैनिटाइजर्स से साफ कराए जाते हैं.

थॉमस गिल्बर्ट कहते हैं कि अगर आप सारा दिन घर पर रहते हैं और आपके घर हर रोज 20 अजनबी नहीं आते हैं तो हाथ धोने की वैसी जरूरत नहीं है.

गिल्बर्ट कहते हैं, "अपनी कार में या अपने घर के दरवाजे पर सैनिटाइजर की बोतल रखना खराब नहीं है. लेकिन, ये चीजें तभी अच्छी हैं जबकि आपके घर पर सिंक, साबुन और पानी न हो. मैं हैंड सैनिटाइजर के मुकाबले हमेशा साबुन और पानी को तरजीह देता हूं."

पानी डालती महिला
इमेज कैप्शन, दुनिया के कई हिस्सों में पानी की किल्लत की वजह से बार-बार हाथ धोना मुश्किल हो सकता है.

तो हमें अभी भी कितनी-कितनी देर में हाथ धोने चाहिए?

महामारी की शुरुआत के वक्त ब्रिटेन की सरकार की वैज्ञानिक सलाह थी कि लोगों को हर कुछ घंटे में हाथ धोने चाहिए. ऐसा तब था जबकि ज्यादातर लोग घरों में ही बंद थे.

गिल्बर्ट कहते हैं कि ऐसा उन लोगों के लिए जरूरी नहीं है जो कि ज्यादातर वक्त घर पर ही रहते हैं. हालांकि, उन्हें निश्चित तौर पर टॉयलेट जाने के बाद और खाने से पहले और बाद अच्छी तरह से हाथ धोने चाहिए.

ऐसे लोग जो कि किसी कोविड-19 के मरीज की देखभाल कर रहे हैं उन्हें कहीं ज्यादा जल्दी-जल्दी हाथ धोने की जरूरत होती है.

यूनिवर्सिटी ऑफ उट्रेच की पीएचडी छात्रा थी मुई फाम की अगुवाई वाले एक पेपर में कहा गया है कि किसी संभावित रूप से संक्रमित शख्स या सतह के संपर्क में आने के तुरंत बाद हाथ धोना बार-बार हाथ धोने के मुकाबले कहीं ज्यादा असरदार साबित होता है.

ग्राफिक

एंटी-वायरस हैंडवॉश की बजाय साबुन

कुछ लोग एंटी-वायरल हैंडवॉश का इस्तेमाल करने लगे हैं और सोचते हैं कि ये सामान्य साबुन के मुकाबले ज्यादा प्रभावी होते हैं. माइकेलिस कहते हैं, "लेकिन, ऐसा है नहीं."

वे कहते हैं, "आपको इस तरह की चीजों की बिलकुल जरूरत नहीं है. मार्केट में मौजूद ज्यादातर एंटी-माइक्रोबायल्स दरअसल एंटी-बैक्टीरियल हैं."

वे चेतावनी देते हैं, "इनसे आने वाले वक्त में मुश्किल बढ़ और सकती है. अगर बेकार पानी में बहुत ज्यादा एंटी-बैक्टीरियल होंगे (जो कि वायरस पर काम नहीं करते हैं) तो आपमें बैक्टीरियल रजिस्टेंस के ज्यादा आसार होंगे."

"आपके इस्तेमाल किए जाने वाले बाकी सभी डिसइनफेक्टेंट्स पर्यावरण के लिए ज्यादा चिंताएं पैदा करने वाले हो सकते हैं और इनसे रजिस्टेंट बैक्टीरिया की और मुश्किलें पैदा हो सकती हैं."

गिल्बर्ट और माइकेलिस दोनों ही इस बात से सहमत हैं कि कोरोना वायरस से लड़ाई में हाथ धोने के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी के पीने योग्य गुणवत्ता का होना जरूरी नहीं है. ऐसे में आपके पास मौजूद किसी भी पानी का इस्तेमाल हाथ धोने में किया जा सकता है.

ऐसी जगहों पर जहां पानी की उपलब्धता कम है या स्वच्छ पानी आसानी से नहीं मिलता है वहां पर इससे आसानी होती है.

हाल में ही वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने कहा है कि दुनिया के हर पांच में से केवल दो स्कूलों में ही कोरोना वायरस के आने से पहले हाथ धोने की पर्याप्त व्यवस्था थी.

माइकेलिस कहते हैं, "जब तक आपके पास साबुन है कोई दिक्कत नहीं है. आप ऐसे पानी में तैर सकते हैं जिसे आप पी नहीं सकते क्योंकि आपकी त्वचा एक अवरोध का काम करती है."

कोरोना टेस्ट

इंफ्लूएंजा रोकने में मिली मदद

2020 की पहली छमाही पर कोरोना वायरस महामारी का फ्लू सीजन पर भी असर दिखाई दिया है.

साल के शुरुआती कुछ महीनों में सामान्य मानवीय संपर्क के न होने के चलते इंफ्लूएंजा की दर में गिरावट देखी गई है और इस तरह से इंफ्लूएंजा से मौतें भी कम हुई हैं.

मिसाल के तौर पर, दक्षिण अफ्रीका के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर कम्युनिकेबल डिजीज (एनआईसीडी) को मार्च से अगस्त के बीच हर साल गंभीर फ्लू के करीब 700 मामलों का सामना करना पड़ता था. इस साल ऐसा केवल एक मामला आया है.

फ्लू के कम मामलों के आने से हो सकता है कि कुछ क्लीनिक जरूर बंद हो गए हों, लेकिन इससे महामारी के दूसरे पहलुओं के बारे में भी पता चल रहा है.

इससे दिख रहा है कि बार-बार हाथ धोने से हम दूसरी कई बीमारियों से भी बच रहे हैं.

सर्दियों के महीने में कम गंभीर फ्लू के स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाले दबाव को भी कम किया जा सकता है बशर्ते हमारी हाथ धोने की आदत जारी रहे.

माइकेलिस कहते हैं, "यह एक अच्छा बदलाव हो सकता है."

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