रविवार, 17 मई, 2009 को 12:11 GMT तक के समाचार
गठन के महज एक वर्ष के भीतर ही वाम दलों की अगुआई वाले तीसरे मोर्चे का भविष्य अधर में लटक गया है. इन्हें चुनाव में तगड़ा झटका लगा है.
चुनाव परिणाम सामने आने के बाद तीसरे मोर्चे की सोमवार को प्रस्तावित बैठक रद्द करनी पड़ी क्योंकि इसमें शामिल कई दल इच्छुक नहीं थे.
तीसरे मोर्चे का पहला झटका तो चुनाव से पहले ही लगा था जब तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) इससे अलग हो गई थी.
लेकिन लोकसभा चुनाव में तीसरे मोर्चे में शामिल वाम दलों और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को ज़बर्दस्त झटका लगा जबकि जनता दल (सेक्युलर) और तेलुगुदेशम पार्टी को भी अपेक्षित सफ़लता नहीं मिल पाई.
बसपा की नेता मायावती सोमवार को दिल्ली पहुँच रही हैं लेकिन उनका किसी भी वाम दल के साथ बैठक तय नहीं है.
वहीं टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू का दिल्ली आना ही तय नहीं है.
हालांकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के नेता एबी बर्धन का कहना है, "हमारे सभी साथी साथ हैं. उन सभी को अब ये देखना होगा कि क्या किया जाए, किन नीतियों को अपनाया जाए ताकि भविष्य में मज़बूत होकर उभरा जा सके."
'कांग्रेस को समर्थन'
दूसरी ओर फ़ॉरवर्ड ब्लॉक के नेता देबब्रत विश्वास ने माना कि तीसरा मोर्चा चुनाव परिणाम के बाद के परिदृश्य की कल्पना थी.
उन्होंने कहा, "अब बैठक की कोई ज़रूरत ही नहीं है. तीसरे मोर्चे का गठन सरकार बनाने के लिए हुआ था जो अब संभव नहीं है."
तीसरे मोर्चे के मुख्य घटक जेडीएस ने कहा है कि वो केंद्र में कांग्रेस की अगुआई में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार को समर्थन देने के लिए तैयार हैं.
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के कर्नाटक प्रभारी ग़ुलाम नबी आज़ाद ने टेलीफ़ोन कर उनसे जेडीएस का समर्थन माँगा.
कुमारस्वामी ने बताया, "हमने उनसे कहा कि पार्टी इस पर विचार करेगी. उन्होंने हमें केंद्र सरकार में शामिल होने का भी न्यौता दिया."